री मन चंचल ना होता,
सोने के मृग पे विहवल ना होता,
न राम हिरण के पीछॆ जाते,
ना रावण सीता हर पाते,
"सोने " की मन ने चाह उठाईं,
इसी लिए "सीता" अग्नि में समाई,
उसी चंचलता की सजा उसने पाई,
क्यू लोग "राम"पे दोष धरे भाइ,
रौपदी ने जिन पे व्यंग कशा,
उसने द्रौपदी का ढंग नही देखा,
अन्धों पे अंध की तानाकशी,
उड गई द्रौपदी कि भरी सभा में हसी,
किन्तु नारी अस्मिता का प्रश्न बड़ा था,
इसी लिए चिर धरने कृष्णा खड़ा था,
जो कुदरत के मारे हो, उसपे ताने नही मारते
हर बार कृष्णा भी नही संकट से उबारते,
सोने के मृग पे विहवल ना होता,
न राम हिरण के पीछॆ जाते,
ना रावण सीता हर पाते,
"सोने " की मन ने चाह उठाईं,
इसी लिए "सीता" अग्नि में समाई,
उसी चंचलता की सजा उसने पाई,
क्यू लोग "राम"पे दोष धरे भाइ,
रौपदी ने जिन पे व्यंग कशा,
उसने द्रौपदी का ढंग नही देखा,
अन्धों पे अंध की तानाकशी,
उड गई द्रौपदी कि भरी सभा में हसी,
किन्तु नारी अस्मिता का प्रश्न बड़ा था,
इसी लिए चिर धरने कृष्णा खड़ा था,
जो कुदरत के मारे हो, उसपे ताने नही मारते
हर बार कृष्णा भी नही संकट से उबारते,
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