Wednesday, 20 March 2013

तन्हा-तन्हा हम रो लेंगे महफ़िल-महफ़िल गायेंगे, जब तक आंसू साथ रहेंगे तब तक गीत सुनायेंगे, तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं, देर न करना घर जाने में वरना घर खो जायेंगे, बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारें छूने दो, चार किताबे पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जायेंगे, किन राहों से दूर है मंजिल कौन सा रास्ता आसान है, हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे, अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर दिल हों मुमकिन है, हम तो उस दिन रायें देंगे जिस दिन धोखा खायेंगे..
मेरी तसवीर लेकर क्या करोगे तुम , मेरी तसवीर लेकर,,,,,, चले हो अब ना जाने कब मिलोगे, सबब कोई मिलेगा तब मिलोगे,,, ना जिने का ना मरने का बहाना, कटेगा कैसे उल्फत का जमाना, हमे दे जाओ उल्फत की निशानी, बड़ी होगी तुम्हारी महेरबानी,,, सब्र की कोई तदबीर होगी, हमारे पास ये तसवीर होगी, मेरी तसवीर ने मुजसे कहा हे, के ये बेजान हे बेजुबाँ हे, तुम्हारे काम ना ये आ शकेगी, तुम्हारा दिल ना ये बेहला शकेगी, जुनूं में तो गिरेबा चाक होगा , के परवाना जलके खाक होगा तुम्हारे सामने जो हम ना होंगे, ये गम तसवीर से तो कं ना होंगे,,, यूँ हि तडपोगे तुम आहे भरोगे,,,,,,,, मेरी तसवीर लेकर क्या करोगे तुम , मेरी तसवीर लेकर,,,,

Tuesday, 19 March 2013

" दिल की चोटों ने कभी .. चैन से रहने न दिया... जब चली सर्द हवा ... मैंने तुझे याद किया ; इसका रोना नहीं.. क्यों तुमने किया .. दिल बरबाद... इसका ग़म है... कि बहुत देर में... बरबाद किया ; इतना मासूम हूँ फितरत से .. कली जब चटकी ... झुक के मैंने कहा .. मुझसे कुछ इरशाद किया ; मुझको तो होश नहीं ... तुमको खबर हो शायद ... लोग कहते हैं... कि तुमने मुझे बर्बाद किया ; वो तुझे याद करे ... जिसने भुलाया हो कभी ... हमने तुझ को न भुलाया.. न कभी याद किया..." ~~~~~~~~~~~~~ ' जोश मलीहाबादी '
" दिल की चोटों ने कभी .. चैन से रहने न दिया...
जब चली सर्द हवा ... मैंने तुझे याद किया ;

इसका रोना नहीं.. क्यों तुमने किया .. दिल बरबाद...
इसका ग़म है... कि बहुत देर में... बरबाद किया ;

इतना मासूम हूँ फितरत से .. कली जब चटकी ...
झुक के मैंने कहा .. मुझसे कुछ इरशाद किया ;

मुझको तो होश नहीं ... तुमको खबर हो शायद ...
लोग कहते हैं... कि तुमने मुझे बर्बाद किया ;

वो तुझे याद करे ... जिसने भुलाया हो कभी ...
हमने तुझ को न भुलाया.. न कभी याद किया..."

~~~~~~~~~~~~~ ' जोश मलीहाबादी '

Sunday, 10 March 2013

Akhilesh Sharma 8 hours ago " जिनसे हम छूट गये.. अब वो जहां कैसे हैं... शाखे गुल कैसे हैं .. खुश्बूह के मकां कैसे हैं ; ऐ सबा ! तू तो उधर से ही.. गुज़रती होगी... उस गली में.. मेरे पैरों के निशां कैसे हैं ; कहीं शबनम के शगूफ़े .. कहीं अंगारों के फूल... आके देखो.. मेरी यादों के जहां कैसे हैं ; मैं तो पत्थर था .. मुझे फेंक दिया.. ठीक किया... आज उस शहर में .. शीशे के मकां.. कैसे हैं ..." जिनसे हम छूट गये .. अब वो जहां .. कैसे हैं ।। ~~~~~~~~~~~ ' राही मासूम रज़ा '

Wednesday, 6 March 2013

अपने होने का हम इस तरह पता देते थे खाक़ मुट्ठी में उठाते थे, उड़ा देते थे उसकी महफ़िल में वही सच था वो जो कुछ भी कहे हम भी गूंगों की तरह हाथ उठा देते थे अब मेरे हाल पे शर्मिंदा हुये हैं वो बुजुर्ग जो मुझे फूलने-फलने की दुआ देते थे अब से पहले के जो क़ातिल थे बहुत अच्छे थे क़त्ल से पहले वो पानी तो पिला देते थे वो हमें कोसता रहता था जमाने भर में और हम अपना कोई शेर सुना देते थे घर की तामीर में हम बरसों रहे हैं पागल रोज दीवार उठाते थे, गिरा देते थे हम भी अब झूठ की पेशानी को बोसा देंगे तुम भी सच बोलने वालों के सज़ा देते थे [राहत इन्दौरी]

Sunday, 3 March 2013

राह-ए-सफ़र से जैसे कोई हमसफ़र गया साया बदन की क़ैद से निकला तो मर गया ताबीर जाने कौन से सपने की सच हुई इक चाँद आज शाम ढले मेरे घर गया थी गर्मी—ए—लहू की उम्मीद ऐसे शख़्स से इक बर्फ़ की जो सिल मेरे पहलू में धर गया है छाप उसके रब्त की हर एक शे`र पर वो तो मेरे ख़याल की तह में उतर गया इन्सान बस ये कहिए कि इक ज़िन्दा लाश है हर चीज़ मर गई अगर एहसास मर गया इस ख़्वाहिश-ए-बदन ने न रक्खा कहीं का `तूर' ! इक साया मेरे साथ चला मैं जिधर गया. :: कृश्न कुमार 'तूर' ::