Saturday, 28 July 2012

इश्क की आग हे, दोतरफा वार करती हे,
इज़हार में भी जलती हे, इनकार में भी जलती हे,
तुमको छूने की, बस एक तमन्ना हे दिल में,
हर एक साँस तडपती हे, वो एक धड़कन खलती हे
इस दिल का, अब वो, अजीब हाल हो रहा हे,
ना ये आँखें, भीगती हे , ना ये पलकें सुखती हे,
अब दर्दे-दिल को, तुमसे कहे तो कैसे कहे,
जो बात दिल में हे, दिल में ही पलती हे,
ए लख्ते जिगर, जब्ते जिगर, कब तक हम करे,
वो कह के ही रहेंगे, धड़कने जो बात कहती हे
अब इनकार,या इज़हार के क्या माइने "मुकेश"
राहे ही, जब हर मोड़ को, मंज़िल तक ढेहती हे

76 ·  · 
जिंदगी भर जिंदगी का गम रहा,
एक ही अंदाज़ का मौसम रहा,
अब सेहरा सी, आँखें , सुर्ख पथरा गई,
सदियों तक आँखों में , वो सनम रहा
में बे-वफाइ,किस-किस कि,किस-किस से कहूँ,
जब बे-वफ़ा, हमीसे,सारा आलम रहा,
ओर दोस्तों का " खुलुश" जब , आजमाया तो,
दिल से पशेमान, मेरा "दुश्मन" रहा
ख्श्बूओ ने इस कदर तदपा दिया "मुकेश"
गमें खार में भी, फूलों का भरम रहा

Wednesday, 25 July 2012

जिन्दगी के अँगना में,
सपने बुआ ए, सपने बुआ ए,
बिटिया के किलकारी घर जब लाये,
सुनी झोपड़ी या में, दीपक जलाये ,
बंजर जमीनीया में अमृत बहाये,
लछ्मी को अपने छाती से लगाए, ,,ओ,,.हो...हो..ओ ...हो..हो.ओ,
गछीया पे अम्बुआके , फल जब आए,
पीहर भये अपने, नैहर पराये,
मइया के अंखीयोसे सरयू बहाये,
लछ्मी के अपने छाती से लगाए,

दोस्तों ये एक प्राइवेट लॉक गीत हे,
जो मेरे मित्र विशाल चतुर्वेदी ने डाइरेक्ट किया हे ओर ग्रुप की सारी जानकारी पोस्ट पे हे, हमारे देश की ये दुविधा हे के हम कोलावरी दी, पसंद कर लेते हे, पर अपनी जमीन , अपना लॉक संगीत जिसे हम आसानी से नही अपनाते,इस गाने के शब्द,ओर भाव को शांत मन से सुने, कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ ये एक आवाज़ हे जिसे ज्यादा-से ज्यादा शेर करे
ओर अपना सहयोग प्रदान करे...............

Wednesday, 18 July 2012

हे  नारी,,,,,,,,,,,,,,,
तू शक्ति हे पर चंचल हे,
तुजसे ही ब्र्हमांड में सब हल-चल हे,
तुज बिन ये पुरुष शरीर भी "शव" हे,
पर :"सत्य " पौरुष" हे,
युगों से कल्पो से,
अचल हे,अडिग हे,
तेरा प्रयास हे , "पुरुष", {सत्यं}
चलित हो,
ओर जहां -तक ब्र्ह्मांड हे,
जीव-सृष्टि हे, तेरा प्रयास,
कभी सफल नही होगा,
प्रलय का देवता सब नष्ट कर शकता हे,
पर सत्यं को हिलने नही देगा,
क्योँकि वो सर्वोपरि हे,
बलिष्ठ अचल अडिग,
वो ही "राम" हे,
जो सत्य का अंश मात्र,
होने पर स्पर्श मात्र से अहल्या को, 
पत्थर से चलित नारी कर शक्ता हे,
"सत्य' नारायण हे,
शायद इसी लिए वेद-व्यास जी ने,
राम को या क्रश्न को,
"सत्य"  का अंशा अवतार होने पर,
"सत्य "के पूर्ण स्वरूप नारायण को ही,
सर्वोपरि दर्शाया हे,
"सत्य "को सर्वोपरिता दी हे
...........सत्यम्‌ धी महि.........

Tuesday, 17 July 2012

मुझ से पहले तुझे जिस शख्स ने चाहा होगा
शायद अब भी तेरा ग़म दिल से लगा रखा हो
एक बेनाम- सी उमीद पे अब भी शायद
अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रखा हो

मैंने माना कि वो बेगाना-ए-पैमाना-वफ़ा
खो चुका है जो किसी और की रानाई में
शायद अब लौट के आए न तेरी महफ़िल में
और कोई दुःख न रुलाए तुझे तन्हाई में

मैंने माना कि शबो- रोज़ के हंगामों में
वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता-रफ़्ता
चाहे उमीद की शमए हों कि यादों के चिराग़
मुस्तक़िल बोअद बुझा देता है रफ़्ता-रफ़्ता

फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे
मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं
ज़ख्म भर जाएं मगर दाग़ तो रह जाता है
दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं

ये भी मुमकिन है कि एक दिन वो पशेमाँ होकर
तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले
तू की मासूम भी है, ज़ूद -फ़रामोश भी है
उसकी पैमाँ- शिकनी को भी गवारा कर ले

और मैं, जिसने तुझे अपना मसीहा समझा
एक ज़ख्म और भी पहले की तरह सह जाऊं
जिस पे पहले भी कई अहदे-वफ़ा टूटे हैं
इसी दोराहे पे चुपचाप खड़ा रह जाऊं

______________________फ़राज़

Saturday, 14 July 2012

भरे शहर में सब को प्यारे थे हम-तुम,
मोहल्ले में सब के दूलारे थे हम-तुम,
में हीरो था कितनो का शादी से पेहले,
था हंगामा फितनौ का शादी से पेहले,
मेरे शादी-शुदा  मित्र एक बार जरूर सुने, 
ये कव्वाली आप की जिंदगी का" लुत्फ" उठा रही हे,
आप भी अपनी-अपनी कहानी मेहसूस कर शकते हे, 

Friday, 13 July 2012

हे  नारी,,,,,,,,,,,,,,,
तू शक्ति हे पर चंचल हे,
तुजसे ही ब्र्हमांड में सब हल-चल हे,
तुज बिन ये पुरुष शरीर भी "शव" हे,
पर :"सत्य " पौरुष" हे,
युगों से कल्पो से,
अचल हे,अडिग हे,
तेरा प्रयास हे , "पुरुष", {सत्यं}
चलित हो,
ओर जहां -तक ब्र्ह्मांड हे,
जीव-सृष्टि हे, तेरा प्रयास,
कभी सफल नही होगा,
प्रलय का देवता सब नष्ट कर शकता हे,
पर सत्यं को हिलने नही देगा,
क्योँकि वो सर्वोपरि हे,
बलिष्ठ अचल अडिग,

वो ही "राम" हे,
जो सत्य का अंश मात्र,
होने पर स्पर्श मात्र से अहल्या को,
पत्थर से चलित नारी कर शक्ता हे,
"सत्य' नारायण हे,

शायद इसी लिए वेद-व्यास जी ने,
राम को या क्रश्न को,
"सत्य"  का अंशा अवतार होने पर,
"सत्य "के पूर्ण स्वरूप नारायण को ही,
सर्वोपरि दर्शाया हे,
"सत्य "को सर्वोपरिता दी हे,

Thursday, 12 July 2012

तोता उड,  तितली उड,
कौवा उड,  पेड़ उड,
कैह् जाना,  सामने वाले के,
पेड़ उड केहने पे भयभीत  हो जाना,
कल को ये पेड़ शायद उड जयेगा,
इनसान महेंगाइ में,
ओर क्या कर पायेगा,
लॉक तंत्र का मंतर अब जंगल में चलता हे,
ओर पेड़ तो क्या, अब आधा जंगल उड़ता हे
नेता अब कोंक्रीट का जंगल बना रहे हे,

बड़े ही निर्ममता से पेड़ों को कटवा रहे हे,
कल को गिने-चुने पेड़ "धरोहर" बन कर दिखेंगे,
जँगल में भी पेड़ अब सुरक्षित  नही रहेंगे,
गुना-भाग करते रहते हे पर्यावरण वाले,
बच्चो की पेड़ उड वाली,
उक्ति कोई उन्हें समजाये,

Saturday, 7 July 2012

धरा के तन से धूल बहा ले गई,
पेहली बारिश की बूँदें, जैसे कानोमे कुछ कैह् गई,
हलका -हलका मन में सुरुर उठ रहा हे,
बदन में एक अजब सी सिहरन दौड़ गई,

शुष्क धरती के होठ, प्यासे हो जैसे सदियों से,
बूँद-बूँद अमृत बन उसे तर कर गई,

Friday, 6 July 2012

सफर में धूप तो होगी, जो चल शकों तो चलो,
सभी हे भीड़ में तुम भी निकल शकों तो चलो,
किसीके वास्ते,............. राहें कहाँ बदलती हे,
तुम अपने आप को,...... बदल शकों तो चलो,
यहा किसीको कोई,........... रास्ता नही देता,
मुजे गिरा के अगर तुम, संम्हल शकों तो चलो,
येही हे जिंदगी, ......कुछ ख्वाब चंद उम्मीदे,
इन्ही खिलौनों से तुम भी, बेहेल शकों तो चलो