mukesh875
Saturday, 14 April 2012
जिंदगी भी अजीब पहेली हे,
कभी दुश्मन तो, कभी सहेली हे
कभी दिल खिल उठता हे फुलोसा,
जैसे दुल्हन कोई नई- नवेली हे,
किसी का इंतज़ार हे आँखों को,
उम्मीदें ईस-कदर पलकों पे गीली हे,
ये कैसा जुर्म हे दीवाने दिल का,
पुरी काइनात मुहोब्बत में हिली हे,
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment