Wednesday, 20 March 2013
तन्हा-तन्हा हम रो लेंगे महफ़िल-महफ़िल गायेंगे,
जब तक आंसू साथ रहेंगे तब तक गीत सुनायेंगे,
तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं,
देर न करना घर जाने में वरना घर खो जायेंगे,
बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारें छूने दो,
चार किताबे पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जायेंगे,
किन राहों से दूर है मंजिल कौन सा रास्ता आसान है,
हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे,
अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर दिल हों मुमकिन है,
हम तो उस दिन रायें देंगे जिस दिन धोखा खायेंगे..
मेरी तसवीर लेकर क्या करोगे तुम ,
मेरी तसवीर लेकर,,,,,,
चले हो अब ना जाने कब मिलोगे,
सबब कोई मिलेगा तब मिलोगे,,,
ना जिने का ना मरने का बहाना,
कटेगा कैसे उल्फत का जमाना,
हमे दे जाओ उल्फत की निशानी,
बड़ी होगी तुम्हारी महेरबानी,,,
सब्र की कोई तदबीर होगी,
हमारे पास ये तसवीर होगी,
मेरी तसवीर ने मुजसे कहा हे,
के ये बेजान हे बेजुबाँ हे,
तुम्हारे काम ना ये आ शकेगी,
तुम्हारा दिल ना ये बेहला शकेगी,
जुनूं में तो गिरेबा चाक होगा ,
के परवाना जलके खाक होगा
तुम्हारे सामने जो हम ना होंगे,
ये गम तसवीर से तो कं ना होंगे,,,
यूँ हि तडपोगे तुम आहे भरोगे,,,,,,,,
मेरी तसवीर लेकर क्या करोगे तुम ,
मेरी तसवीर लेकर,,,,
Tuesday, 19 March 2013
" दिल की चोटों ने कभी .. चैन से रहने न दिया...
जब चली सर्द हवा ... मैंने तुझे याद किया ;
इसका रोना नहीं.. क्यों तुमने किया .. दिल बरबाद...
इसका ग़म है... कि बहुत देर में... बरबाद किया ;
इतना मासूम हूँ फितरत से .. कली जब चटकी ...
झुक के मैंने कहा .. मुझसे कुछ इरशाद किया ;
मुझको तो होश नहीं ... तुमको खबर हो शायद ...
लोग कहते हैं... कि तुमने मुझे बर्बाद किया ;
वो तुझे याद करे ... जिसने भुलाया हो कभी ...
हमने तुझ को न भुलाया.. न कभी याद किया..."
~~~~~~~~~~~~~ ' जोश मलीहाबादी '
" दिल की चोटों ने कभी .. चैन से रहने न दिया...
जब चली सर्द हवा ... मैंने तुझे याद किया ;
इसका रोना नहीं.. क्यों तुमने किया .. दिल बरबाद...
इसका ग़म है... कि बहुत देर में... बरबाद किया ;
इतना मासूम हूँ फितरत से .. कली जब चटकी ...
झुक के मैंने कहा .. मुझसे कुछ इरशाद किया ;
मुझको तो होश नहीं ... तुमको खबर हो शायद ...
लोग कहते हैं... कि तुमने मुझे बर्बाद किया ;
वो तुझे याद करे ... जिसने भुलाया हो कभी ...
हमने तुझ को न भुलाया.. न कभी याद किया..."
~~~~~~~~~~~~~ ' जोश मलीहाबादी '
जब चली सर्द हवा ... मैंने तुझे याद किया ;
इसका रोना नहीं.. क्यों तुमने किया .. दिल बरबाद...
इसका ग़म है... कि बहुत देर में... बरबाद किया ;
इतना मासूम हूँ फितरत से .. कली जब चटकी ...
झुक के मैंने कहा .. मुझसे कुछ इरशाद किया ;
मुझको तो होश नहीं ... तुमको खबर हो शायद ...
लोग कहते हैं... कि तुमने मुझे बर्बाद किया ;
वो तुझे याद करे ... जिसने भुलाया हो कभी ...
हमने तुझ को न भुलाया.. न कभी याद किया..."
~~~~~~~~~~~~~ ' जोश मलीहाबादी '
Sunday, 10 March 2013
Akhilesh Sharma
8 hours ago
" जिनसे हम छूट गये.. अब वो जहां कैसे हैं...
शाखे गुल कैसे हैं .. खुश्बूह के मकां कैसे हैं ;
ऐ सबा ! तू तो उधर से ही.. गुज़रती होगी...
उस गली में.. मेरे पैरों के निशां कैसे हैं ;
कहीं शबनम के शगूफ़े .. कहीं अंगारों के फूल...
आके देखो.. मेरी यादों के जहां कैसे हैं ;
मैं तो पत्थर था .. मुझे फेंक दिया.. ठीक किया...
आज उस शहर में .. शीशे के मकां.. कैसे हैं ..."
जिनसे हम छूट गये .. अब वो जहां .. कैसे हैं ।।
~~~~~~~~~~~ ' राही मासूम रज़ा '
Wednesday, 6 March 2013
अपने होने का हम इस तरह पता देते थे
खाक़ मुट्ठी में उठाते थे, उड़ा देते थे
उसकी महफ़िल में वही सच था वो जो कुछ भी कहे
हम भी गूंगों की तरह हाथ उठा देते थे
अब मेरे हाल पे शर्मिंदा हुये हैं वो बुजुर्ग
जो मुझे फूलने-फलने की दुआ देते थे
अब से पहले के जो क़ातिल थे बहुत अच्छे थे
क़त्ल से पहले वो पानी तो पिला देते थे
वो हमें कोसता रहता था जमाने भर में
और हम अपना कोई शेर सुना देते थे
घर की तामीर में हम बरसों रहे हैं पागल
रोज दीवार उठाते थे, गिरा देते थे
हम भी अब झूठ की पेशानी को बोसा देंगे
तुम भी सच बोलने वालों के सज़ा देते थे
[राहत इन्दौरी]
Sunday, 3 March 2013
राह-ए-सफ़र से जैसे कोई हमसफ़र गया
साया बदन की क़ैद से निकला तो मर गया
ताबीर जाने कौन से सपने की सच हुई
इक चाँद आज शाम ढले मेरे घर गया
थी गर्मी—ए—लहू की उम्मीद ऐसे शख़्स से
इक बर्फ़ की जो सिल मेरे पहलू में धर गया
है छाप उसके रब्त की हर एक शे`र पर
वो तो मेरे ख़याल की तह में उतर गया
इन्सान बस ये कहिए कि इक ज़िन्दा लाश है
हर चीज़ मर गई अगर एहसास मर गया
इस ख़्वाहिश-ए-बदन ने न रक्खा कहीं का `तूर' !
इक साया मेरे साथ चला मैं जिधर गया.
:: कृश्न कुमार 'तूर' ::
Saturday, 2 March 2013
"मैं तो झोंका हूँ.. हवा का.. उड़ा ले जाऊँगा...
जागती रहना.. तुझे तुझसे.. चुरा ले जाऊँगा ;
हो के कदमों पे निछावर .. फूल ने बुत से कहा...
ख़ाक में मिल के भी मैं .. खुश्बू बचा ले जाऊँगा ;
कौन सी शै मुझको .. पहुँचाएगी तेरे.. शहर तक...
ये पता तो तब चलेगा .. जब पता ले जाऊँगा ;
कोशिशें मुझको.. मिटाने की .. भले हों कामयाब...
मिटते-मिटते भी मैं.. मिटने का मजा.. ले जाऊँगा ;
शोहरतें.. जिनकी वजह से.. दोस्त दुश्मन हो गये...
सब यहीं रह जायेंगी ..मैं साथ क्या .. ले जाऊँगा ..."
****************** ' कुमार विश्वास '
Thursday, 28 February 2013
यूँ ही तन्हाइ में हम दिल को सजा देते हे,
नाम लिखते हे तेरा लिखके मीता देते हे,,,,
जब भी ना-कम मुहोब्बत का कोई जिक्र करें,
लोग हँसते हे मेरा नाम बता देते हे ,
अब खुशी की कोई तरकीब ना सोचे दुनिया,
अब ये आलम हे कुछ गम ही मजा लेते हे,,
अब तसल्ली नही दी जाती मरीज-ए-गम को,
देखने वाले भी मरने की दुआ देते हे,,,,,
अब तसल्ली नही दी जाती मरीज-ए-गम को,
देखने वाले भी मरने की दुआ देते हे,,,,,
Tuesday, 26 February 2013
चलो कुछ शब्दों की उत्तपत्ति पे सर्च करे,
अलग-अलग प्राणी ओ का अध्ययन करे,,
दो शब्द सुनने में आए,
हुंह जूनियर हुंह सीनियर हुंह,
जैसे सुनता हूँ कही पर हाउ,
इसपे जूनियर सीनियर,
ओर हो शकते हे ताइ-ताउ ,
शब्दों की उत्पत्ति में,
पशु ओ का बड़ा योग दान हे,
कुत्ते से हाउ, ओर नाग से हुँह-कार हे,
पर मेने इस पे खोजबीन की,
हुंह की उत्तपत्ती में बंदर का भी योगदान हे,
पेहले बंदर भी कर लेते होंगे हुंह,
अप-भ्रंश हो के हो गया हुप्प ,
अब हुंह की उत्तपत्ती,
नाग ओर नागिन के नाम जाती हे,
इस में अहंकार के जहर की बू आती हे,
हाउ-हाउ,, हुंह-हुंह से जो भी आहत होता हे,
वो अब आह-आह ओर उन्ह-उन्ह करता हे,
Monday, 25 February 2013
इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं.. गुज़रने वाले ...
मौत की राह.. नहीं देखते ... मरने वाले ;
आख़िरी वक़्त भी.. पूरा न किया वादा-ए-वस्ल ...
आप आते ही रहे .. मर गये.. मरने वाले ;
उठ्ठे और.. कूच-ए-महबूब में पहुँचे.. आशिक़ ...
ये मुसाफ़िर नहीं .. रस्ते में ठहरने वाले ;
जान देने का कहा मैंने .. तो हँसकर बोले ...
तुम सलामत रहो .. हर रोज़ के मरने वाले ;
आस्माँ पे .. जो सितारे नज़र आये 'आमीर' ...
याद आये मुझे .. दाग़ अपने .. उभरने वाले..."
****************** ' आमीर मीनाई '
Saturday, 23 February 2013
शायर है वो कोई दीवाना तो नहीं
लपटों में झुलसे वो परवाना तो नहीं
मगरिब का तारा, इस्मे-आज़म का प्यारा
अपना न सही लेकिन बेगाना तो नहीं
साहिबाँ हूँ मैं कोई फ़नकार तो नहीं
मेरे वास्ते यूसुफ़ का बाज़ार तो नहीं
झूठी रवायत मैं लानत पे भेजूं
दौलत-शोहरत मेरे यार तो नहीं
मकाँ टूटा है कोई घर तो नहीं
आवारा हूँ पर दर -बदर तो नहीं
रसम तोड़ना ख़ूब आता है मुझको
क़सम तोड़ने का हुनर तो नहीं
एक ही है ऊपर, दस-बीस तो नहीं
ख़ुदा है ख़ुदा, नक़्शानवीस तो नहीं
_______________________साहिब, बीबी और ख़ुदा
[साहिब दुनियादार हैं , बीबी बेक़ार हैं और ख़ुदा है कि थोड़ा ग़ैर ज़िम्मेदार
है. सब गड्डमगड्ड कर के ये एक महाबकवास देसी सोनेट तैयार है. ऐंवें ! मस्ती
में.]
Wednesday, 20 February 2013
बारहा दर-ब-दर पत्थर तलाशते हैं ये।
वह जो मिल जाय तो इक सर तलाशते हैं ये।।
हद हुई ताज की भी मरमरी दीवारों पर,
बदनुमा दाग़ ही अक्सर तलाशते हैं ये।
साफ़गोई से फ़ित्रतन न वास्ता इनका,
मंच ऊँचा व पा ज़बर तलाशते हैं ये।
बदख़याली से सरापा हैं ख़ुद सियाह बदन,
चाँद के मिस्ल हमसफ़र तलाशते हैं ये।
इनको फ़ुर्सत है कहाँ मिह्रबान होने की,
ख़ुद ज़ुरूरत पे मिह्रवर तलाशते हैं ये।
देख ग़ाफ़िल! हैं मह्वेख़ाब इस क़दर मयकश,
चश्मे-साक़ी में भी साग़र तलाशते हैं ये।।
(साफ़गोई=स्पष्टवादिता, पा ज़बर=मज़बूत पैर वाला, चाँद के मिस्ल=चाँद सा,
हमसफ़र=जीवनसाथी, मिह्रवर=मिह्रबाँ, कृपा करने वाला, मह्वेख़ाब=स्वप्न में
लीन, चश्मे-साक़ी=साक़ी की आँख, साग़र-शराब से भरा प्याला)
-ग़ाफ़िल
ख़ामोशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए
ये तमाशा अब सरे बाज़ार होना चाहिए
ख़्वाब की ताबीर पर इसरार है जिनको अभी
पहले उनको ख़्वाब से बेदार होना चाहिए
अब वही करने लगे दीदार से आगे की बात
जो कभी कहते थे बस दीदार होना चाहिए
बात पूरी है अधूरी चाहिए ऐ जान-ए-जाँ
काम आसां है इसे दुश्वार होना चाहिए
दोस्ती के नाम पर कीजे न क्यूँ कर दुश्मनी
कुछ न कुछ आख़िर तरीकेकार होना चाहिए
झूठ बोला है तो उस पर क़ायम भी रहो ‘ज़फ़र’
आदमी को साहिब-ए-क़िरदार होना चाहिए -‘ज़फ़र’ इक़बाल
किस-किस अदा से तूने.. जलवा दिखा के मारा...
आज़ाद हो चुके थे .. बन्दा बना के मारा ;
अव्वल बना के पुतला .. पुतले में जान डाली...
फिर उसको ख़ुद क़ज़ा की.. सूरत में आके मारा ;
आँखों में तेरी ज़ालिम .. छुरियाँ छुपी हुई हैं...
देखा जिधर को तूने .. पलकें उठाके मारा ;
ग़ुंचों में आके महका .. बुलबुल में जाके चहका...
इसको हँसा के मारा .. उसको रुला के मारा ;
सोसन की तरह 'अकबर'.. ख़ामोश हैं यहाँ पर...
नरगिस में इसने छिप कर.. आँखें लड़ा के मारा..."
~~~~~~~~~~~~~ ' अकबर इलाहाबादी '
अव्वल : पहले
क़ज़ा : मौत
सोसन : एक कश्मीरी पौधा
Tuesday, 19 February 2013
जो सजर सूख गया हे हरा कैसे हो,,
में पयम्बर तो नही मेरा कहा कैसे हो,,,
जिसको जाना ही नही उसको खुदा क्यूँ माने,
ओर जिसे जान चुके हे वो खुदा कैसे हो,,,,,
दूर् से देख के मैंने उसे पहचान लिया,
उसने इतना भी नही मुजसे कहा कैसे हो,,,,
वो भी एक दौर जब मैंने तुजे चाहा था,,
दिल का दरवाजा हे, हर वक्त खुला कैसे हो,,,
Monday, 18 February 2013
महज 4 साल पेहले मेरे दिमाग की सफेद नस फट गई डॉक्टर कैह् रहा था ब्रेन-हैमरेज हे,,,,,,,
नादान हे बेचारा, ,,,,,,,,
उसे क्या पता मेरे बदन की कुछ रगो में बर्फ जमी हुई हे,,,,,
जो लगातार उष्ण-कटी बंध को ठंडा कर रही हे,,,
ये प्रकिया कभी-कभी लगता हे युगों से चल रही हे मेरे दिमाग में,
शायद एंटार्तिका उसी से बर्फाच्छादीत हे,,,,
ओर में भी इसी गुमा में हूँ के मेने उष्ण-कटी बंध को ठंडा कर दीया हे,
{ग्यारहवा दरवाजा},,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Saturday, 16 February 2013
DUSRO KO HAMARI SAJAYE NA DE,
CHANDNI RAAT MEIN BADDUAYE NA DE.
PHOOL SE AASHIQUI KA HUNAR SIKH LE,
TITALIYA KHUD RUKEGI SADAYEN NA DE.
SAB GUNAHO KA IQRAR KARNE LAGE
IS KADAR KHUBSURAT SAJAYE NA DE.
MOTIYON KO CHUPA,SIPIYON KI TARAH,
BEWAFAON KO APNI WAFAYE NA DE.
MEIN BIKAHAR JAOGA MOTIYON KI TARAH,
IS TARAH PYAR SE MUJHE BADDUAYE NA DE.
CHANDNI RAAT MEIN BADDUAYE NA DE.
PHOOL SE AASHIQUI KA HUNAR SIKH LE,
TITALIYA KHUD RUKEGI SADAYEN NA DE.
SAB GUNAHO KA IQRAR KARNE LAGE
IS KADAR KHUBSURAT SAJAYE NA DE.
MOTIYON KO CHUPA,SIPIYON KI TARAH,
BEWAFAON KO APNI WAFAYE NA DE.
MEIN BIKAHAR JAOGA MOTIYON KI TARAH,
IS TARAH PYAR SE MUJHE BADDUAYE NA DE.
Friday, 15 February 2013
इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिये
आप दरिया हैं तो फिर इस वक्त हम खतरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हमको पार होना चाहिये
ऐरे गैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों
आपको औरत नहीं अखबार होना चाहिये
जिंदगी कब तलक दर दर फिरायेगी हमें
टूटा फूटा ही सही घर बार होना चाहिये
अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दें मुझे
इश्क के हिस्से में भी इतवार होना चाहिये
मुनव्वर राना
होनी न चाहिए थी मुहब्बत, मगर हुई
पड़ना न चाहिए न ग़ज़ब में, मगर पड़े
जबीं काबे में रख दी, या सर-ए-कू-ए-बुताँ रख दी ग़रज़ अब उठ नहीं सकती, जहां रख दी वहाँ रख दी
ना नशेमन है न है शाख़-ए-नशेमन बाक़ी ...... लुत्फ़ जब है कि करे अब कोई बर्बाद मुझे
होनी न चाहिए थी मुहब्बत, मगर हुई
पड़ना न चाहिए न ग़ज़ब में, मगर पड़े
चलो जाओ.. हटो.. कर लो.. तुम्हें जो वार करना है...
हमें लड़ना नहीं है.. बस.. हमें तो प्यार करना है ;
मुहब्बत लाख गहरी हो.. मगर ये बात लाज़िम है...
कि पहली बार में तो.. हुस्न को.. इन्कार करना है ;
अभी कुछ शेर.. सीना चीर कर.. उतरा नहीं करते...
तिरे अबरू को.. थोड़ा और भी.. ख़मदार करना है ;
इसी चक्कर में.. हमने सैकड़ों.. दीवान पढ़ डाले...
सुना कर शेर.. उसको .. प्यार का इज़हार करना है ;
ये क्या है.. अब कहानी.. बीच में क्यों रोक रक्खी है...
ज़बाँ को ही.. नज़र के बाद बस.. इक़रार करना है ;
मुझे जाने दो.. मेरे और भी.. कुछ काम बाक़ी हैं...
जिसे महफ़िल सजानी है .. उसे तैयार करना है..."
~~~~~~~~~~~~~~~ ' अना कासमी '
अबरू : भवें
ख़मदार : टेड़ा
दीवान : ग़ज़ल की पान्डो लिपि ग़ज1
Thursday, 14 February 2013
Tuesday, 12 February 2013
" जैसे होती थी किसी दौर में.. हैवानों में...
बेसकूनी है वही.. आज के.. इंसानों में ;
जल्द उकताते हैं हर चीज़ से.. हर मंजिल से...
ये परिंदों की सी.. आदत भी है.. दीवानों में ;
उम्र भर सच के सिवा कुछ न कहेंगे.. कह कर...
नाम लिखवा लिया.. अब हमने भी नादानों में ;
जिस्म दुनिया में भी.. जन्नत के मज़े लेता रहा...
रूह.. इक उम्र.. भटकती रही.. वीरानों में ;
उसकी मेहमान नवाजी की.. अदाएं देखीं ...
हम भी सकुचाए से बैठे रहे.. बेगानों में ;
नाम.. सूरत तो हैं.. पानी पे लिखी तहरीरें ...
मेरी पहचान रहेगी .. मेरे अफसानों में ;
जो भी होना है.. वो निश्चित है.. अटल है ‘श्रद्धा’...
क्यूँ न कश्ती को.. उतारे कभी... तूफानों में ...."
~~~~~~~~~~~~~~~~ ' श्रद्धा जैन '
Sunday, 10 February 2013
Friday, 8 February 2013
श्री रामचंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणं !
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं !!
कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरम !
पट पीत मानहु तड़ित रूचि शुचि नौमि जनक सुतावरं !!
भजु दीनबंधू दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं !
रघुनंद आनंद कंद कोसल चन्द्र दशरथ नन्दनं !!
सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदार अंग विभूशनम !
आजानु भुजषर चाप धर संग्राम जित खर दूषणं !!
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं !
मम ह्रदय कंज निवास कुरु कामादि खल दल गंजनं !!
मनु जाहि राचेउ मिलही सो वर सहज सुन्दर सांवरो !
करुना निधान सुजान सीलु सनेहू जानत रावरो !!
एही भाँती गौरी असीस सुनि सिय सहित हिय हर्षित अलि !
तुलसी भवानी पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चलि !!
NIBHA SAKO TU KARO PIYAR WARNA MAT KARMA
BICHAR KAR TUM KABHI HUM KO UDAS MAT KARNA
ABHI BHI WAQT HAI CHAHO TU TUM SANBHAL JAO
KARO NA FIKR MERI AGE TUM NIKAL JAO
FESLA JO HO TUMHARA KARNE ME DER MAT KARMA
BICHAR KAR TUM KABHI HUM KO UDAS MAT KARNA
TUMHARE PIYAR ME AAJ JO MERI HALAT HAI
HAR IK LAMAHA LAGE K QIYAMAT HAI
MERA JO HAAL HAI APNA WO HAAL MAT KARMA
BICHAR KAR TUM KABHI HUM KO UDAS MAT KARNA
निभा सको तो करो प्यार वरना मत करना,,,
बिछड़ के तुम कभी हमको उदास मत करना,,,
अभी भी वक्त हे चाहो तुम सम्हल जाओ,
करो
जो फैसला हे कर लेना, देर मत करना,
BICHAR KAR TUM KABHI HUM KO UDAS MAT KARNA
ABHI BHI WAQT HAI CHAHO TU TUM SANBHAL JAO
KARO NA FIKR MERI AGE TUM NIKAL JAO
FESLA JO HO TUMHARA KARNE ME DER MAT KARMA
BICHAR KAR TUM KABHI HUM KO UDAS MAT KARNA
TUMHARE PIYAR ME AAJ JO MERI HALAT HAI
HAR IK LAMAHA LAGE K QIYAMAT HAI
MERA JO HAAL HAI APNA WO HAAL MAT KARMA
BICHAR KAR TUM KABHI HUM KO UDAS MAT KARNA
निभा सको तो करो प्यार वरना मत करना,,,
बिछड़ के तुम कभी हमको उदास मत करना,,,
अभी भी वक्त हे चाहो तुम सम्हल जाओ,
करो
जो फैसला हे कर लेना, देर मत करना,
Wednesday, 30 January 2013
शम्म; की तरहा पिघलते हुए दिल देखे हे,
अश्क बन बन के निकलते हुए दिल देखे हे,,
तुने देखेही नही गर्मी-ए-रुखसार-ए-हया,
हमने इस आग में जलते हुए दिल देखे हे,
जो भी केहना वहां मेरी जुबानी केहना,
लोग कुछ भी कहे तुम आग को पानी केहना,
आज वो शख्स जमाने में हे यक्ता केहदो,
कल कोई दूसरा मिल जाए तो शानी केहना,,,
ये अगर पलकों पे थम जाए तो, आंसू कहीयो,
ओर बेह जाए तो दरीया की रवानी केहना,,,,,
जितना जी चाहे इसे आज हकीकत केहलो,
कल मेरी तरहा इसे तुम भी कहानी केहना,,,,,
टूटते लम्हों को मुठ्ठी में जकडने वालों,
क्या मिलेगा तुम्हे परछाई से लड़ने वालों,,,,,
मेरे तलवों ने तो काँटों की रीफाकत चुनली,
कुछ नही राह् में अब पाँव रगड़ने वालों,,,,,,,
अपने दामन की सियाही तो मिटा लो पेहले,
मेरी पेशानी पे रुस्वाइया जड़ने वालों,,,,,
मेरी बातें ना सुनो अपना कहा तो मानो,
वक्त के सामने जुक जाओ अकडने वालों,,,,,,
उम्रभर बैठ के रोना कोई आसान नही,
अपनी यादें भी लिए जाओ बिछडने वालों,,,
Tuesday, 29 January 2013
क्या कहूँ दिल पे कयामत सी गुजर जाती हे,
इत्तेफाकन जो किसी आंख में आँसू चमके,,,
कितनी गजलों को तेरे नाम से मनसूब किया,
मेरी ख्वाहिश थी भरे शहेर में एक तू चमके,,,,
क्या जमाना था के हम रोज़ मिला करते थे,,
रात भर चाँद के हमराह फिरा करते थे,,,,,
कर दीये आज जमाने उन्हें भी मजबूर,
कभी ये लोग मेरे दुःख की दवा करतें थे,,,,,
देखकर वो हमे चुप-चाप निकल जाता हे,
कभी उस शख्स को हम प्यार किया करते थे,,,,
जहां तन्हाइया घर छोड़ के सो जाती हे,,,
इन मकानों में अजब लोग रहा करते थे,,,,
वो गजलवालों को अजीब समजते होंगे,,
प्यार केहते हे जिसे खूब समजते होंगे,
कितनी मिलती हे तेरी सूरत,
लोग तुजको मेरा मेहबूब समजते हे,,,,,
Sunday, 27 January 2013
तलाशते ही रह गए,.
हो गए किस क़दर दर-ब-दर,,
समजाते ही रह गए,
ना समजे जिंदगी है अजीब सफ़र,,
हम दूर निकल आए,
मंजील को तलाशते हुए,
पीछे रह गए सब,
अहबाब और हमारा ही घर,,,,,,,
ये कैसी तलाश है हमारी,
जो कभी थमती ही नहीं,
रास्ते ही रास्ते हे जहां,
ना मंज़िल हे ना कोई घर,,,,,,,
खुदा भी हमीं से करे हे,
मज़ाक़ नहीं तो और क्या है,
हम ख़ुद ही को तलाशते रहे,
ओर ख़ुद से ही हे बेख़बर,,,,,,मुकेश जोशी,,,,
Saturday, 26 January 2013
हे कहा का इरादा तुम्हारा सनम, किसके दिल को अदा ओ से बहेलाओगे,
सच बताओके इस चाँदनी रात में किससे वादा किया हे कहा जाओगे,,
परवाने तो जल जाते हे रोशनी की तलब में,
ए शम्म; तेरे ज़हन की कालीप देख् खाक हो गए,
देखो ना तुम हो गए िकस क़दर, दर-ब-दर,
हम ना कहते थे के िजदगी है, अजीब सफ़र ।
तुम दूर निकल गए, मंिजल को तलाशते हुए,
पीछे रह गए सब अहबाब और तुम्हारा ही घर।
ये कैसी तलाश है तुम्हारी, जो कभी थमती ही नहीं,
दूर ले गई हम से, हमारा मंज़िल-ए-हमसफ़र ।
ये हमसे िकस्मत का मज़ाक़ नहीं तो और क्या है,
हम तुम्हें तलाशते रहे और तुम हो ख़ुद से ही बेख़बर ।
samajaate
Thursday, 24 January 2013
लिख दिया अपने दर पे किसीने,
इस जगह प्यार करना मना हे,
प्यार गर हो भी जाए किसी को,
इसका इज़हार करना मना हे,,,
उनकी महफिल में जब कोई जाए,
पेहले नजरे वो अपनी जुकाये,
वो सनम जो खुदा बन गए हे,,
उनका दीदार करना मना हे,,,,,,
जाग उठेंगे तो आहे भरेंगे,
हुश्न वालों को रुस्वा करेंगे,
सो गए हे तो फुरकत के मारे,
उनको बेदार करना मनाहे,
हमने की अर्ज ए-बन्दा-परवर,
क्यूँ सितम धा रहे हो ये हम पर,
बात सुनकर हमारी वो बोले,
हमसे तकरार करना मना हे,
सामने जो खुला हे जो मौका,
खा ना जाना कतिल उनका धौखा,
अब भी उस गली में,
सौख-ए- दीदार करना माना हे,
मेरे रस्क-ए-कमर तूने पेहली नजर,
जब नजर से मिलाइ मजा आ गया,,,,
बर्क सी गिर गई, काम ही कर गइ,
आग ऐसी लगाई , मजा आ गया,,,,,
जाम में घोल कर हुश्न की मस्तियां,
चाँदनी मुस्कुराईं मजा आगया,
चाँद के साये में ए मेरे साथिया,
तूने ऐसी पिलाइ मजा आ गया,
नशा शीशे में अँगड़ाई लेने लगा,
बज्म-ए-रींदा मे सागर खनक ने लगा,
मै-कदे पे बरसने लगी मस्तियां .
जब घटा घीर के छाई ,मजा आ गया,,,,,
बे-हिजाबाना वो सामने आ गये,,
ओर जवानी से जवानी टकरा गई,
आँख उनकी लड़ी यूँ मेरी आँख से,
देखकर ये लड़ाई मजा आ गया,
आँख में थी हया, हर मुलाकात पर,
सुर्ख आरीद हुए वसाला की बात पर,
उसने शरमाके मेरे सवालात पे,
ऐसे गरदन जुकाइ मजा आ गया,
शेख साहिब का ईमान बिक ही गया,
देखकर हुश्ने साकी पिघल ही गया,
आज से पहेले वो कितने मगरुर थे,
लूट गई पारसाइ मजा आ गया,
ए फना शुक्र हे आज बाद -ए-फना,
उसने रखली मेरे प्यार की आबरू,
अपने हाथों से उसने मेरी कब्र पर,
चादर-ए-गुल चढ़ाई ,मजा आ गया,
Tuesday, 22 January 2013
रिसते हुए जख्मो से लहू ने,
उसे दिल में उतर ने ना दिया,
में तो मरना चहता था लेकिन,
कम-बख्त सांसो ने मरने ना दिया, mukesh joshi,,
दुःख की लहेर ने छेड़ा होगा,,,,,
याद ने कंकर फेंका होगा,,,,,,,
आज तो मेरा दिल केहता हे,
तु इस वक्त अकेला होगा,,,,
मेरे चूमे हुए हाथो से,
भौंरों को खत् लिखता होगा,,,,,
यादों की जलती शबनम से,
फुल सा मुखड़ा रोया होगा,,,,,,,,,
मोती जैसी शकल बना कर,
आयने में वो तकता होगा,,,,,,,,,
में तो आज बहोत रोया हूँ,
तू भी शायद रोया होगा,,,,,,,,
"नासिर" तेरा मीत पुराना,
तुजको याद तो आता होगा,,,,,,,,
Monday, 21 January 2013
तेरे आने का धौका सा रहा हे,,,,,,,
दीया सा रात भार जलता रहा हे,,,,,,
अजब हे रात से आँखों का आलम,
ये दरीया रात भर चढ़ता रहा हे,,,,,,
सुना हे रात भर बरसा हे बादल,
मगर वो शहेर जो प्यासा रहा हे,,,,,
वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का,
जो पिछली रात से याद आ रहा हे,,,,,
किसे ढ़ूँढोगे इन गलियों में नासिर ,
चलो अब घर चले दिन जा रहा हे,,,,,
Tuesday, 15 January 2013
Friday, 11 January 2013
में रोया परदेश में भीगा माँ का प्यार,
दुःख ने दुःख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार,
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार,
आँखों भर आकास हे बाँहों भर संसार,
लेके तन के नाप को घूमें बस्ती गांव,
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाव,
सबकी पुजा एक् सी, अलग-अलग हर रीत,
मस्जिद जाए मौलवी, कोयल गाये गीत,
पुजा घर में मूर्ति मीराँ के संग श्याम,
जिसकी जितनी चाकरी उतने उसके दाँम,
नदियां सींचें खेत को, तोता कुतरे आम,
सूरज ठेकेदार सा सब को बाँटे काम,,
सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर,
जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फ़कीर,
अच्छी संगत बैठकें सेंगी बदले रूप,
जैसे मिलके आम से मीठी हो गई धूप,,,
सपना जरना नींद का जागी आँखें प्यास,
पाना खोना खोजना, सांसो का इतिहास,
चाहे गीता बांचीये, या पढिये कुरान,
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान,,,,,
Wednesday, 9 January 2013
तुम्हे दिल्लगी भुल जानी पड़ेगी,
मुहोब्बत की राहो में आ कर तो देखो,,,,
तड़प ने पे मेरे ना फिर तुम हँसोगे,
कभी दिल किसी से लगाकर तो देखो,,,,,,
तुम्हे दिल्लगी भुल जानी पड़ेगी,
मुहोब्बत की राहो में आ कर तो देखो,,,,
तड़प ने पे मेरे ना फिर तुम हँसोगे,
कभी दिल किसी से लगाकर तो देखो,,,,,,
खून रुलायेगी ये लगी दिल की,
खेल समजो ना दिल्लगी दिल की,,
वफ़ा ओ की हमसे तवक़्क़ो नही हे,
मगर एक बार आजमा कर तो देखो,
जमाने को अपना बनाकर तो देखा,
हमे भी तुम अपना बनाकर तो देखो,,,,
Tuesday, 8 January 2013
जोड़ लगते गए फसाने में,
राज खुलते गए छुपाने में,
रूठने का सबब तो तुम जानो,
हम तो मशरुफ हे मनाने में,
तूने तिनके समज के फूँक दिया,
मेरी दुनिया थी आशीयाने में,,,,,,,,,,,,
करार लूंट लिया बे-करार छोड़ गए,
बहार ले गए याद-ए-बहार छोड़ गए,
हमारी तिश्नगी का ना कुछ खयाल किया,
उम्र-भर के लिये अश्क-वार छोड़ गए,,,,,,,,,,
बे-ख़ुद किए देते हे अंदाज़-ए-हिजाबाना,
आ दिल में तुजे रखलू, ए-जल्वा-ए-जनाना,,,,,,
परिशा हो के मेरी खाक,
आख़िर दिल ना बन जाए,
जो मुश्किल अब हे या रब,
फिर वोही मुश्किल ना बन जाए,
उरूज-ए-आदम-ए-खाकी से,
अंजुम सहमे जाते हे,
के ये टूटा हुआ तारा,
माह-ए-तमिल ना बन जाए,
मेरा मकाम अर्स था लेकिन अब फर्स हे,
आसमां से उतारा गया,
में तो आ-दम,
आ-दम ,से हुई ना फरमानी,
जन्नत से उथा दाना-पानी,
दाना होकर नादां बना,
एक दाने पे एक दिन नादान,
खता शैतान की आदम को,
खींचा पाव से जन्नत से,
ना था कुछ तो खुदा था,
कुछ ना होता तो खुदा होता,यहा होना ना होना हे,
ना होना में एहले होना हे
ना था कुछ तो खुदा था,
कुछ ना होता तो खुदा होता,
डुबोया मुजको होने ने,
ना में होता तो क्या होता,
यहा होना ना होना हे,
अगर पेहरे माहानी से ,
ये कतरा जुदा ना होता,
जिंदगी मौत का निशाना हे,
सबको यहा से एक दिन जाना हे,
Sunday, 6 January 2013
दोस्तों की शिकायत करूँ में,
ये भी मुजको गवारा नही हे,,,,
दोस्तों ने करम वो किए हे ,
जिन्दगी की तमन्ना नही हे,,,,,,
सोचकर बे-वफ़ा मुजको कहिये,
खुल ना जाए भरम आपका भी,
आजमाया हे दुनिया को मैंने,
आपने मुजको परखा नही हे,
हो के बेताब मैयत पे मेरी,
तुम ये क्यूँ बे-नकाब आ गये हो,
उम्र भर जिससे परदा किया था,
आज क्यूँ उस से परदा नही हे,
Wednesday, 2 January 2013
तेरे गम को जां की तलाश थी,
तेरे जां-निसार चले गए,,,,,,,
तेरी राह् में करते थे सर तलब,
सर-ए-राह्-गुजार चले गए,,,,,,,,
ये हमीं थे जिनके लिबास पर,
सर-ए-राह् सियाही लिख्खी गइ,
ये ही दाग थे जो सजाके हम,
सर-ए-बज़्म-ए यार चले गए,,,,,,,,,,
तेरी कच अदाइ से हार के,
सब-ए-इंतज़ार चली गई,
मेरे जब्त-ए-हाल से रूठ के,
मेरे गम-गुसार चले गए,
ना सवाल-ए-वस्ल, ना अर्ज-ए-गम,
ना हिकायते, ना शीकायते,
तेरे एहेद में दिल-ए-जार की,
सारे इख्तेयार चले गए,,,,,,,,,
ना रहा जुनून-ए रुख-ए-वफ़ा,,,
ये रसम ये डार करोगे क्या,,?
तेरे गम को जां की तलाश थी,
तेरे जां-निसार चले गए,,,,,,,
तेरी राह् में करते थे सर तलब,
सर-ए-राह्-गुजार चले गए,,,,,,,,
ये हमीं थे जिनके लिबास पर,
सर-ए-राह् सियाही लिख्खी गइ,
ये ही दाग थे जो सजाके हम,
सर-ए-बज़्म-ए यार चले गए,,,,,,,,,,
तेरी कच अदाइ से हार के,
सब-ए-इंतज़ार चली गई,
मेरे जब्त-ए-हाल से रूठ के,
मेरे गम-गुसार चले गए,
ना सवाल-ए-वस्ल, ना अर्ज-ए-गम,
ना हिकायते, ना शीकायते,
तेरे एहेद में दिल-ए-जार की,
सारे इख्तेयार चले गए,,,,,,,,,
ना रहा जुनून-ए रुख-ए-वफ़ा,,,
ये रसम ये डार करोगे क्या,,?
जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज़ था,
वो गुनाह्-गार चले गए,,,,,,,,,,
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