किरण जी, एकलव्य का जीवन तो तभी, सार्थक हो गया, जब गुरु द्रोण को अपनी शीखाइ विध्या पे संदेह हो गया, ओर गुरु द्रोण ने वो अँगूठा अर्जुन का हित देखकर नहीं अपनी विध्या का पराभव ओर एकलव्य की निष्ठा का विजय होता हुआ देख कर किया, ओर पराभव को रोकने हेतु
भीख में अँगूठा लिया,
भीख में अँगूठा लिया,
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