Monday, 30 April 2012


दिवसों जुदाई ना जाई छे,
ए जसे जरूर मिलन सुधी,
मुज हाथ झाली ने लइ जसे,
मुज शत्रु ओ ज स्वजन सुधी,
ना धरा सुधी ,ना गगन सुधी,
ना उन्नति , ना पतन सुधी,
फकत आपने तो जवु हतु ,
एक-मेक ना मन सुधी,
तमे  राज-रानी ना चिर सम,
अमें रंक नार नी चुंददी,
तमे तन पर रहो घड़ी-बे-घड़ी,
अमें साथ दइये कफन सुधी,
जो हृदय नी आग वधी गई,
तो इश्वरे ज कृपा करी,
कोई श्वास बंध करी गयु,
के पवन ना जाए अगन सुधी,
तमे  रंक ना छो रत्न समा,
ना मलो ए आँसू धूल माँ,
जो अरज कबूल हो आटली,
तो हृदय थी जाओ नयन सुधी,



दिवसों जुदाई ना जाई छे,
ए जसे जरूर मिलन सुधी,
मुज हाथ झाली ने लइ जसे,
मुज शत्रु ओ ज स्वजन सुधी,
ना धरा सुधी ,ना गगन सुधी,
नाही उन्नति , ना पतन सुधी,
फकत आपने तो जवु हतु ,
एक-मेक ना मन सुधी,
तमे  राज-रानी ना चिर सम,
अमें रंक नार नी चुंददी,
तमे तन पर रहो घड़ी-बे-घड़ी,
अमें साथ दइये दफन सुधी,

Sunday, 29 April 2012

इनसानो की किमत  कुछ भी नही,
इंसानो की किमत जब इनके ,
सिक्कों में  ना तोली जायेगी,,,,वो सुबहा,,,,
वो सुबहा कभी तो आयेगी,.......
वो सुबहा कभी तो आयेगी,,,,,,,,,
इन काली सदियों के सर से,
जब रात का आँचल ढलकेगा,
जब दुःख के बादल पिघलेंगे,
जब सूख का सागर छलकेगा,
जब अंबर झुम के नाचेगा,
जब धरती नग्में गायेगी,...वो सुबहा,,,,,,,,,,
जिस सुबहा की खातिर युग-युग् से,
हम सब मर-मर कर जीते है,
जिस सुबहा के अमृत की धुन में,
हम झहर के प्याले पीते है,
इन भुखी-प्यासी रूहों पर ,
एक-दिन तो करम फरमायेगी,..वो  सुबहा,,,,
माना के अभी तेरे  मेरे ,
अरमानो की कीमत कुछ भी नही,
मिट्‍टी का भी है कुछ मोल मगर,

इनसानो की किमत  कुछ भी नही,
इंसानो की इज़्ज़त  जब जूठे ,
सिक्कों में  ना तोली जायेगी,,,,वो सुबहा,,

वो सुबहा कभी तो आयेगी,.......
वो सुबहा कभी तो आयेगी,,,,,,,,,
इन काली सदियों के सर से,
जब रात का आँचल ढलकेगा,
जब दुःख के बादल पिघलेंगे,
जब सूख का सागर छलकेगा,
जब अंबर झुम के नाचेगा,
जब धरती नग्में गायेगी,...वो सुबहा,,,,,,,,,,
जिस सुबहा की खातिर युग-युग् से,
हम सब मर-मर कर जीते है,
जिस सुबहा के अमृत की धुन में,
हम झहर के प्याले पीते है,
इन भुखी-प्यासी रूहों पर ,
एक-दिन तो क्रम फरमायेगी,..वो  सुबहा,,,,
माना के अभी तेरे  मेरे ,
अरमानो की कीमत कुछ भी नही,
मिट्‍टी का भी है कुछ मोल मगर,
इंसानो की कीमत

Saturday, 28 April 2012


गोपाल दास नीरज शनिवार को चंडीगढ़ मेें थे। उन्होंने लगभग दो घंटे तक यूटी गेस्ट हाउस में अपनी चुनिंदा रचनाएं सुनाकर सबको भावविभोर किया। उनकी हर रचना ने सबको बार-बार तालियां बजाने के लिए मजबूर कर दिया। यहां 2 रचनाएं पेश की जा रही हैं।

कारवाँ गुज़र गया

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पातपात झर गये कि शाख़शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँधुआँ पहन गये,
और हम झुकेझुके,
मोड़ पर रुकेरुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
क्या शबाब था कि फूलफूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ ज़मीन उठी तो आसमान उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कलीकली कि घुट गयी गलीगली,
और हम लुटेलुटे,
वक्त से पिटेपिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरनचरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयननयन,
पर तभी ज़हर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पुँछ गया सिंदूर तारतार हुई चूनरी,
और हम अजानसे,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

2.

जीवन नहीं मरा करता है

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है
सपना क्या है, नयन सेज पर सोया हुई आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से सावन नहीं मरा करता है
माला बिखर गई तो क्या है, ख़ुद ही हल हो गई समस्या
आँसू ग़र नीलाम हुए तो, समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फ़टी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आंगन नहीं मरा करता है
लाखों बार गगरियाँ फूटीं, शिक़न नहीं आई पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं, चहल-पहल वो ही है तट पर
तम की उमर बढ़ाने वालों, लौ की आयु घटाने वालों
लाख करे पतझड़ क़ोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है
लूट लिया माली ने उपवन, लुटी न लेकिन गंध फूल की
तूफ़ानों तक ने छेड़ा पर, खिड़की बंद न हुई धूल की
नफ़रत गले लगाने वालों, सब पर धूल उड़ाने वालों
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से, दर्पण नहीं मरा करता है

- गोपाल दास नीरज

नीरज जी से हिन्दी संसार अच्छी तरह परिचित है किन्तु फिर भी उनका काव्यात्मक व्यक्तित्व आज सबसे अधिक विवादास्पद है। जन समाज की दृष्टि में वह मानव प्रेम के अन्यतम गायक हैं। दिनकर जी के कथनानुसार वह हिन्दी की वीणा है' अन्य भाषा भाषियों के विचार से वह 'सन्त कवि है' और कुछ आलोचकों के मत से वह 'निराश मृत्युवादी है'। वर्तमान समय में वह सर्वाधिक लोकप्रिय और लाडले कवि है इन्होंने अपनी मर्मस्पर्शी काव्यानुभूति तथा सहज सरल भाषा द्वारा हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया है और बच्चन जी के बाद कवियों की नई पीढ़ी को सर्वाधिक प्रभावित किया। आज अनेक गीतकारों के कंठ में उन्हीं की अनुगूँज है। नीरज जी प्रमुख रचनाएँ 'दर्द दिया', 'प्राण गीत', 'आसावरी', 'बादर बरस गयो', 'दो गीत', 'नदी किनारे', 'नीरज की गीतिकाएँ', संघर्ष, विभावरी, नीरज की पाती, लहर पुकारे, मुक्तक, गीत भी अगीत भी इत्यादि हैं।

Friday, 27 April 2012


हमसे अच्छी कही आइने की किस्मत होगी,
रूबरू उसके तेरी चाँद सी सूरत होगी,
मेने पुजा हे हरेक रोज़ तसव्वुर में तुम्हे,
दिल के मंदिर में चले आओ, इनायत होगी,
मुंतजिर क्यू रहे अब कोई,कयामत का भला,
तुम सलामत हो तो हर रोज़ कयामत होगी,
ख्वाब क्या देखिये जन्नत की हसी गलियों का,
वो जहां होंगे वही हुश्न की जन्नत होगी,
बेजुबानी खलती रह गई ....
आँखों से नमी सी बह गई ..
दिल जो कैह् ना पाया,
वो अश्को की "धार" सब कह गई,
है अजीब हालत ये, अब चैन हे ना करार हे,
दिल को मेरे उनपे, एतबार हे ना इक़रार हे
जिंदगी मुजको ना जाने, किस मकाम पे ढह गई,
ये कैसी उलजन हे, दिल में अनजानी चुभन हे,
वो हमराज़ हे ,या हमदम हे, दिल के तारों की सरगम हे,
पर उनसे वस्ल की बात, बात तक ही रह गई.

Friday, 20 April 2012

मुहोब्बत ही ना जो समजे, वो जालिम प्यार क्या जाने,
निकलती दिल के तरो से जो हे, जनकार क्या जाने,
उसे तो कत्ल करना ओर तडपाना ही आताहे,
गला किसका काँटा क्यूँ कर तलवार क्या जाने,
दवा से फायदा होगा, के होगा झहेरे कातिल से,
मरझ की क्या दवा हे, ये कोई बीमार क्या जाने,
करो फरियाद सर तकराओ,अपनी जान दे डालो,
तड़पते दिल की हालत हुश्न की दीवार क्या

Thursday, 19 April 2012











जब खनक उठ्ठे किसी शाख पे पत्ता कोई,,
गुड़-गुदाये तुम्हे बीता हुआ लम्हा कोई,
जब मेरी याद का बे-चैन पपीहा कोई,
जी को रह-रह के जलाये  तो  मुजे  खत् लिखना,........तुम को जब नींद.........
जब निगाहों के  लिए कोई नजारा ना रहे,
चाँद छुप जाए  गगन पर कोई तारा ना रहे,
भरे संसार में  जब कोई सहारा ना रहे,
लोग हो जाए पराये तो मुजे खत् लिखना..,.
जब मेरी याद सताये तो........

जब मेरी याद सताये तो मुजे खत् लिखना,
तुम को जब नींद ना आए तो,मुजे खत् लिखना,...
गीले पेड़ों की, घनी चाव में हँसता सावन,
प्यासी धरती में समाने को,तरसता सावन,
रात को छत पे  लगातार  बरसता सावन,
दिल में जब आग लगाए तो मुजे खत् लिखना,
तुमको जब नींद  ना आए तो मुजे खत् लिखना.....

जब खडक उठ्ठे किसी शाख पे पत्ता कोई,,
गुड़-गुदाये तुम्हे बीता हुआ लम्हा कोई,
जब मेरी याद क्ा बे-चैन पपीहा कोई,
जी को रह-रह के जलाये  तो  मुजे  खत् लिखना,.......
.तुम को जब नींद.........
जब निगाहों के  लिए कोई नजारा ना रहे,
चाँद छुप जाए  गगन पर कोई तारा ना रहे,
भरे संसार में  जब कोई सहारा ना रहे,
लोग हो जाए पराये तो मुजे खत् लिखना..,.
जब मेरी याद सताये तो........

Wednesday, 18 April 2012

જીન્દગી નો જેના પર દારો-મદાર છે,
ઍ લોખંડ્ ની સલાખ નથી, શ્વાસો નાં તાર છે,
જીવી રહ્યો  છું,"મુકેશ્"  ફક્ત એક જ કારણે,
હ્રદય ને ધડકવા સાથે , અસીમ લગાવ છે,
फना  होने का दम रखना ,
तभी भीतर जदम रखाना,
ये  इश्क की राह् आसान  नही,
हौसला दम-बदम रखना,
पलकों पे आके जो थेहरा हे "मोती",
उसमे  कैद तू "सनम"रकना,
अपने दिल के किसी कोने में,
मेहबुब सा हरा तू ज़खम रखना,
करके बरबाद मुजे उसने ये फरमाया है,
जश्न मना ये तेरे प्यार का सरमाया है,
किस्मत ने दी हे मुजे ये कैसी विरानी,
जहा फुल तो फुल खार भी मुरझाया हे,
बनाके दुनिया जो भूल की हे तूने,
तेरे कितने मसलों को हमने सुलझाया हे,
कितने होंगे ओर दर-बदर तेरी चाहत में,
कितनो ने यहा तेरा नक्शे-कदम पाया हे
गर होंसलावर होता ,तो यु पर्दा-दारी न करत्ता,
बनाके हमको क्यू, तूने मुँह छुपाया हे,
नींद से आँख खुली है, अभी देखा क्या हे,
देख लेना अभी कुछ देर में, दुनिया क्या है,
रेत की, ईंट की, पत्थर की, मिट्टी की,
किसी दीवार के साये का भरोसा क्या हे,
बाँध रख्खा हे किसी सोच ने घर से हमको,
वर्ना अपना दरों- दीवार से रिश्ता क्या हे,
अपनी दानिश में समजे कोई, दुनिया साहिद
वर्ना हाथों में लकिरो के ,इलावा क्या है,
ऐसा लगता हे , जिंदगी तुम हो,..
अजनबी कैसे अजनबी तुम हो,.....
अब कोई आरज़ू ,नहीं बाकी,
जूस्तेजु मेरी आखरी ,तुम हो...........
दोस्तों से वफ़ा की, उम्मीदें,
किस जमाने के आदमी तुम हो,......
मै जमी पर घना , अंधेरा हूँ,
आसमानौ की चाँदनी तुम हो,....
तुम को हम दिलमें बसालेंगे तुम आओ तोसही,
सारी दुनिया से छुपा लेंगे, तुम आओ तो सही,
एक वादा करॉ ,अब हमसे ना बिछडोगे कभी,
"नाज़"हम सारे उठा लेंगे ,तुम आओ तो सही,
बे-वफ़ा भी हो, सीतम-गर भी, जफा-पेशा भी,
हम खुदा तुमको बना लेंगे, तुम आओ तो सही,
राह तारीख हे ,और दूर् हे ,मंज़िल लेकिन,
दर्द की शम्मे जला लेंगे, तुम आओ तो सही, ,
फ़ना होने का दम रखना
तभी भीतर कदम रखना .
ये इश्क की राह आसान नहीं,
हौसला दम-बदम रखना,
सांस साँस है, धड़कन-धड़कन,
दिल में, दैरौ-हरम रखना,
जिंदगी यु ही कट जायेगी
सुनहरा सा, कोई भरम रखना,
मेरी राह ,चलना आसान नहीं,
पाँवों में छाले, तन पे "कफन"रखना,
मुफलिसी में मयस्सर क्या होगा,
अरमानो- आरज़ू कही दफन रखना
रोने से गमें दिल का गुज़ारा नहीं होता,
हर अश्क मुहोब्बत में, सहारा नहीं होता
दरीया ये मुहोब्बत में, तुफा भी हे भँवर भी
हर कस्ती की किस्मत में,किनारा नहीं होता
कुछ गम भी,अहेले दिल को, राश आए तन्हाइमे,
हर वकत एक्-सा ,मौसमें , नजारा नहीं होता
चमकती हे बिजलीया भी, कभी-कभी आस्मामे,
हर वकत, कुदरत का ऐसा, इशारा नहीं होता
मुकेश" समेंट ले,वकते वजूद जहासे,
हर कब्र पे , जहामे " मिनारा" नहीं होता
पग पग चले हे जींदगी,
पल पल छले हे जींदगी,
मंज़िल उफक तक,
नजर नहीं आती,
फिर ये किस राह ,
चले हे जींदगी,
जिसकी तामीर अब,
अश्को में ही होनी हे,
ऐसे क्यू ख्वाब ,
बूने हे जींदगी,
दिल शीहर उठता हे,
देख आसना आँखें,
जींदगीमे जब किसीको,
भूले हे जिंदगी,
मेरी चाहत ए "खुदा,"
बस एक तू हे,
ये कैसी, कैसी आँख,
से तू, मुजे घुरे हे जिंदगी,
में नहीं, केहता,
हुश्नौ-इशक़ बूरा हे,
पर इश्क का ये क्या,
अंजाम चुने हे जींदगी
मिला जिन्हें उन्हें , उस्तादगी से ,"उज " मिला,
उसी ने खाई हे ठोकर, जो सर उठाके चले,,,,,,,,,,,
तमाम उम्र जो की सबने बे-रुखी हमसे,
"कफन" में हम भी," अझीजौ" से मुँह छुपाके चले,
ग़लत हे शीकवा ए, दुश्मन के, बाद मरने के,
मेरे "अझीज" मुजे खाक में मिलाके चले
तुज पे एहसान कर रहे हे के, जी रहे हे,हम,
जिंदगी का जहर , हर रोज़ पी रहे हे हम,
हौसला जुटा रहे थे मुद्दत से, हम भी कुछ कहे
पा लिया हौसला ,तो होठौ को सी रहे हे हम,
मुंत्जीर अब नहीं हे वकते, "अजल" का ये जानो-तन,
अपनी ही कबर, अपना कफन,अपना ही रहे हे हम,
ला-असर हर दर्द हे, बे-असर आहे हे "मुकेश"
अपना ही लहू, अपना ही खून पी रहे हे हम,
खुदा के सामने जायेंगे वो किस मुहँ से खुदा जाने ,
मुहब्बत का कोई धब्बा नहीं हैं जिनके दामन पर !!
जुड़ा होता हे जो खुदा से, उनका ख़ुद , खुदा ही हे राह्बर ,
जो ख़ुद बे-दाग हे, वो बे-दाग रखते हे ,अपने बंदे का क्लेवर,
आहौ ने भी तो साथ , लबौ,का दीया नहीं,
मेने ये दिल ,जलाने को ,क्या क्या किया नहीं,
में जी रहा हु, एक मौत के ही इंतज़ार में,
मर्जी से घडी भर यहा में जिया नही,
गिरता रहा हर एक अश्क मेरा, जमीन पर,
बढके किसी ने दामन आगे किया नही,
एक मौत ही खफा है, हमसे नही तो क्या,
वो कौन सा, जहर है जो मैंने पिया नही,
"मुकेश" मुजे है याद, वो आज भी शमा ,
दिल ले लेके बे-वफ़ा ने वापस किया नही
गले लगाके जो सुनते थे दिल कि आहो को,
तरस रहा हूँ उन्ही कि हसीन बाहों को,
दोहाइ हे ए राह्जन दौहाइ हे,
के आज लूट लिया राह् बर ने र!हो को,
किरण जी, हर आदमी अपने आप में एक कलाकार हे, ओर निभाता हे वोही जो यहा उसका किरदार हे , हमे तो सारे उच्च कोटि के नजर आते हे,
ओर सभी उच्च लोगो को सादर साश्तांग दंडवत प्रणाम फरमाते हे,
गुंजाइशे तो थी मगर ,तुमने चाहा ही कब था ?
तुम्हारे जेहनो-दिल ,पे मेरा साया ही कब था..?
अपनी ही बंदगानी में, जो रहे हो मशरुफ उनकों,
अपने- परायो में , महसूस फर्क ही कब था,
i गुलौ में रंग भरे, बादलों-बाहर चले ,
चले भी आओ के हम्-संग कारोबार चले,
जो हम पे गुजरी तो, गुजरी मगर शबे हीजराह,
हमारे अश्क गिरे, आप बस संवार चले,

रस्ता ही रस्ता है, जिंदगी,
मंजिलों का बस्ता है,जिंदगी,
तन्हाइओ का हुजूम हर वक्त है,
जहा तक देखो खस्ता है,जिंदगी

हम-दर्द का भी दर्द तो दर्द हे आखिर,
दर्द से तंग कसा रस्सा है,जींदगी
यादों को सरे-शाम बुलाया नहीं करते,
हर रोज़ तो ये आग, लगाया नहीं करते,
ले दुबे जो दरीया , तुजे अपने ही भँवर में,
ऐसा कोई तूफान उठाया नहीं करते,
तन्हाइ को माशुक समज लेते हे जो लोग,
आया नहीं करते, कही जाया नहीं करते,
हाल-ए -दिल तुमसे, कैसे कहे,
दर्द-ए-दिल , कबसे, ऐसे सहे,
"खामोशीया" जान-लेवा बन गई,
हसरते,खामोश, लबसे कैसे कहे,
हसरते, आरज़ू ,ख्वाबों की, अंजुमन कहा ढोती हे,
मुहोब्बत शीर्फ मुहोब्बत का सीला होती हे,
क्यू नाम , लिख, लिख के तेरा, ये तुम्हें क्या जताते हे,
लोग दैरौ-हरम में भी,तुम्हें"दिया"जलाके, आजमाते हे,

कोई नगमा, कोई नज्म , कोई कलाम तुज पे फरमाता हे,
 हर बसर अपनी मर्जी, दुआ-सलाम,तुजसे कर जाता हे,
कयामत की भीड़ में भी, तन्हा हे हर आदमी,
आरज़ू ए, हसरतो का , हुजूम ढौता हे हर आदमी,
शुकुन के चंद ही पल हे , फिर भी तू मायूस नहो,
गमो का समंदर ही सही, एक मोजे लहर हे आदमी
कही पे"आब",कही "बे-ताब",अजब अंदाज़ है तेरे, "गुलाब" के हाथ में अब ये"गुलाब",गुलाबी मिजाज हे तेरे, same 2 you kiran ji
अपने दिल को लेके कहा जाऊँ,
दिल की बात , लबो पे कैसे लाऊ,
लरजते हे होंठ, थीरकती है,जुबा ,
जज़्बात,को "ल्ब्जौ" का "जामा" दे ना पाउ,

अजीब सी कश्म-कश में , उलज गई है, जिंदगी,
ये कैसी बे-चारगी में, धंस गई जिंदगी,
अब रातों के जिल-मिल तारे , आँखों में उतर आए,
किसी के हिज्र में , सपने आँखों में तैर आए,
अब इस नादान, दिल को कैसे में बेहलाउ
किरण जी, एकलव्य का जीवन तो तभी, सार्थक हो गया, जब गुरु द्रोण को अपनी शीखाइ विध्या पे संदेह हो गया, ओर गुरु द्रोण ने वो अँगूठा अर्जुन का हित देखकर नहीं अपनी विध्या का पराभव ओर एकलव्य की निष्ठा का विजय होता हुआ देख कर किया, ओर पराभव को रोकने हेतु
भीख में अँगूठा लिया,
हम तो दुश्मन को भी पाकीज़ा सजा देते हैं !
हाथ उठाते नहीं,नज़रों से गिरा देते हैं !!
गर दिल में नफरत हो, वो दिल फिर दिल ही कहॉ , 

ओर मुहोब्बत वाले तो, पत्थर को भी मोम बना लेते है,
कुछ अलग बात हे, दीवानों में, उनकी दीवानगी
को क्या कहें,
अपने हाथों से हवाओका ,रुख युही फीरा लेते है
सदीया गुजर गई, इस भेद को मिटानेमें,
औरत ना हो पाई मुक्कमिल,अपना वजूद बनाने में,
ये वकते इंतेहा हे, या औरत का निकम्मापन,
खुदा भी सेंकडा,लगाता हे, लक्ष्मीबाई दिखाने में,
क्यों ख़ुद ही "फना"करती हे, अपने को फर्ज़-ओर धर्म के नाम पर,
क्यों आज भी हिचकिचाती हे, समाज को आइना दिखाने में,
और कितना जलाओ गे, कितना मिटा ओगे खुदको,
समाज नहीं बदलेगा, यु ही कुरबानीया जताने पे,
हवा ओ पे वो नाम लिखदे,
फीज़ा ओमे वो पैग़ाम लिखदे,
जिनकी आगोश में हो रातें "सजी"
उनका ख्वाबों पे नाम लिखदे,
इस कदर दीवानगी का आलम बना,
दीवानो में तू भी अपना नाम लिखदे,
कोई लहर तो तेरी होगी,
उसको थाम उसपे अपना नाम लिखदे,
दील की आग हे, ना जिसमे "जाग" हे
उसे जलते रहेने का इनाम लिखदे
आफताब से निकल के, उजाला कुछ करेगी,
उस पे "किरन" का ' उन्वान" लिखदे,
मन में उठा ये, कोला-हल कैसा,
मन तो है, हिरण चंचल जैसा,
मन के हाथों में मत दो अपनी बाग-डोर,
भगाता रहेगा ये है ,चित्त चोर,
मन बावरा है, मन ही जोगी,
उसकी हसरते कही पूरी नही होगी,
छोटी बड़ी आरजू का मन भोगी
कभी -कभी बे-मतलब मन रोगी,
क्या चाहता है, ये ख़ुद ही ना जाने,
लाख समजाओ पर ये ना माने,
अजब से बजती है, इसमे जब कोई धुन,
ऐसी ही होती है ये मन कि उधेदबुन,
री मन चंचल ना होता,
सोने के मृग पे विहवल ना होता,
न राम हिरण के पीछॆ जाते,
ना रावण सीता हर पाते,
"सोने " की मन ने चाह उठाईं,
इसी लिए "सीता" अग्नि में समाई,
उसी चंचलता की सजा उसने पाई,
क्यू लोग "राम"पे दोष धरे भाइ,

रौपदी ने जिन पे व्यंग कशा,
उसने द्रौपदी का ढंग नही देखा,
अन्धों पे अंध की तानाकशी,
उड गई द्रौपदी कि भरी सभा में हसी,
किन्तु नारी अस्मिता का प्रश्न बड़ा था,
इसी लिए चिर धरने कृष्णा खड़ा था,
जो कुदरत के मारे हो, उसपे ताने नही मारते
हर बार कृष्णा भी नही संकट से उबारते,
चले भी आओ, के अब इंतज़ार नही होता,
मौसमें बाहर में भी,दिल को करार नही होता,
पथराई आँखें ढढु रही है, हर सिम्त तुजको,
एक तू बस एक तू,दिल पे इख्तीयार नही होता,
वो कौनसा रंग है जो, भर गया मेरे ख्वाबो में
होली के रंगों में भी ,उसका सुमार नही होता,
जल की मछली हूँ, जल में भी हूँ प्यासी,
इस समंदर में भी, मन तर-बतर नही होता,
हिज्र में, वीरानीया तन्हाइया, इस कदर घेरे,
के अब खुदा पे भी , एतबार नही होता,
मर भी ना पायेंगे , गर मरना चाहे अगर,
के अपनी चाहतों ,का भी कोई असर नही होता

Sunday, 15 April 2012

अमित  जी बिग ब्रधर आपको  हुक्का  पिला रहे  हे, पता  नही  हमेशा के  लिए, सुला रहे  हे , या सोना लेने भेज रहे  हे,
जिंदगी भी अजीब पहेली हे,
कभी दुश्मन तो, कभी सहेली हे
कभी दिल खिल उठता हे फुलोसा,
जैसे दुल्हन कोई नई- नवेली हे,
किसी का इंतज़ार हे आँखों को,
उम्मीदें ईस-कदर पलकों पे गीली हे,
ये कैसा जुर्म हे दीवाने दिल का,
पुरी काइनात मुहोब्बत में हिली हे,
तोहमतें इश्क भी अब किस पे धरे,
चोट दिल पे अपनी आँखों से मिली हे,
यु ना हो मायुस, हौसला यु ना छोड़,
कहा पत्थर सी उसकी संग-दिली हे,

Saturday, 14 April 2012

जिंदगी भी अजीब पहेली हे,
कभी दुश्मन तो, कभी सहेली हे
कभी दिल  खिल उठता हे फुलोसा,
जैसे दुल्हन कोई नई- नवेली हे,
किसी का इंतज़ार हे आँखों  को,
उम्मीदें ईस-कदर पलकों पे गीली हे,
ये कैसा जुर्म हे दीवाने दिल का,
पुरी काइनात मुहोब्बत में हिली हे,

एहले  दिल यूँ भी निभा लेते हे,
दर्द सीने में छुपा लेते हे,..............
दिल की महेफिल में उजालो के लिए .,
याद की शम्मा जला लेते हे,............
जलते  मौसम में भी ये दीवाने,
कुछ हसी फुल  खिला लेते  हे,.........
जिनको जीना हे  मुहोब्बत के लिए,
अपनी हस्ती को मिटा लेते हे,..........
अपनी आँखों को बनाकर  ये जुबान ,
कितने  अफसाने  सुना लेते हे,लेते  हे, ........
वो मुजे  इसकदर , क्यूँ  रोज़ -रोज़ छले है,
वो खुदा हे भी गर तो, क्यूँ मेरे मन में भरम पले हे,

Thursday, 12 April 2012


दिल की बात लबों पर लाकर,
अब-तक हम दुख सेहते हे,
हमने सुना था इस बस्ती में,
दिल-वाले भी रेहते हे,
एक हमे आवारा केहना,
कोई बड़ा इल्ज़ाम नही,
दुनिया-वाले दिल-वालों को
ओर बहोत कुछ केहते हे,
बीत गया सावन  का महीना,
मौसम ने  नजरे बदली,
लेकिन इन प्यासी आँखों से,
 अब-तक आँसू बेहते हे,
जिनकी खातिर शहेर भी छोड़ा,
जिनके लिए बदनाम हुए,
आज वोही हमसे बेगाने-बेगाने से रेहते हे,...............
वो जो अभी इस राह्-गुजर से,
 चाक गिरेबाँ गुजरा था,उस
आवारा दीवाने को जा-लिब-जा-लिब केहते हे,
जब अंचल रात का लेहराये ओर सारा आलम सो जाए ,
तुम मुजसे मिलने शम्मा जल!कर ताज -महल में आजाना,.................
ये ताज-माहेल जो  चाहत की आँखों का सुनहरा मोती हे,
हर रात जहा दो रूहों की खमोशी जिंदा होती हे,
इस ताज के साये में आकर तुम गीत वफ़ा का दोहराना,
ऎसे में तुम मुजसे मिलने आजाना....

तन्हाइ हे जागी-जागी सी,माहौल हे सोया-सोया हुआ,
जैसे की तुम्हारे ख्वाबों में ख़ुद ताज-महल हे खॊया हुआ,
हो ताज महल का ख्वाब तुम्ही ये "राझ"ना मैंने पेहचाना,
 ऎसे में  तुम शम्मा,...........................
जो मौत मुहोब्बत में आए, वो जान से बढ़कर प्यारी हे,
दो प्यार भरे दिल रोशन हे, दो रात बहोत अंधीयारी हे,
तुम रात के  इस अंधीयारे में बस एक जलक दिखला जाना,................
एसेमे तुम मुजसे मिलने ताज -महल में आजा
जब अंचल रात का लेहराये ओर सारा आलम सो जाए ,
तुम मुजसे मिलाने शम्मा जलकर ताज -महल में आजाना,.................
ये ताज-माहेल जो  चाहत की आँखों का सुनहरा मोती हे,
हर रात जहा दो रूहों की खमोशी जिंदा होती हे,
इस ताज के साये में आकर तुम गीत वफ़ा का दोहराना,
ऎसे में तुम मुजसे मिलाने आजाना....

तन्हाइ हे जागी-जागी सी,माहौल हे सोया-सोया हुआ,
जैसे की तुम्हारे ख्वाबों में ख़ुद ताज-महल हे खॊया हुआ,
हो ताज महल का ख्वाब तुम्ही ये "राझ"ना मैंने पेहचाना,
 ऎसे में  तुम शम्मा,
जो मौत मुहोब्बत में आए, वो जान से बढ़कर प्यारी हे,
दो प्यार भरे दिल रोशन हे, दो रात बहोत अंधीयारी हे,
तुम रात के  इस अंधीयारे में बस एक जलक दिखला जाना,................
एसेमे तुम मुजसे मिलाने ताज -महल में आजा

Wednesday, 11 April 2012


इधर आओ एक्-बार फिर प्यार करले,
निगाहों से रुहोसे को सर-सार करले,
मुकद्दर को मिल-जुल के बेझार करले,
लबों को कही रह ना जाए शिकायत,
मुहोब्बत का पूर- जोश इजहार करले,
मुहोब्बत खुदा जाने क्या रंग लाये,
ये जौके-वफ़ा जाने क्या गुल खिलाये,....2
ये वकते जुदाइ ये बे-ताब मंज़र,
ना-जाने हमे कितनी रातें जगाये,...
ना शर्मा ओ एक-बार फिर प्यार करले........
उखड़ ने को हे शब् की ज़ुल्मत का डेरा,
बरसने को हे आसमा का सवेरा,...2
ना कोशे मुहोब्बत जो पढ़ना हे पढले,
कहा फिर ये किस्मत में रोशन अंधेरा,
अभी वक्त हे आओ..फिर  प्यार करले,........
पसीना जबीं पे हे शर्मा रही हो,
शहेर के तसव्वुर से गबरा रही हो,...... 2
ये आँखों में सौखी ये सीने की धड़कन,
कदम रुक रहे हे मगर जां रही हो,
जो रुक जाओ तो एक-बार फिर प्यार करले,
इधर आओ...............

इधर आओ एक्-बार फिर प्यार करले,
निगाहों से रुहोसे को सर-सर करले,
मुकद्दर को मिल-जुल के बेझार करले,
लबों को कही रह ना जाए शिकायत,
मुहोब्बत का पूर- जोश इक़रार करले,
मुहोब्बत खुदा जाने क्या रंग लाये,
ये जौके-वफ़ा जाने क्या गुल खिलाये,....2
ये वकते जुदाइ ये बे-ताब मंज़र,
ना-जाने हमे कितनी रातें जगाये,...
ना शर्मा ओ एक-बार फिर प्यार करले........
उखड़ ने को हे शब् की ज़ुल्मत का डेरा,
बरसने को हे आसमा का सवेरा,...2
ना कोशे मुहोब्बत जो पढ़ना हे पढले,
कहा फिर ये किस्मत में रोशन अंधेरा,

अभी वक्त हे आओ..फिर प्यार करले........
पसीना जबीं पे हे शर्मा रही हो,
शहेर के तसव्वुर से गबरा रही हो,...... 2
ये आँखों में सौखी ये सीने की धड़कन,
कदम रुक रहे हे मगर जां रही हो,
जो रुक जाओ तो एक-बार फिर प्यार करले,
इधर आओ...............

Tuesday, 10 April 2012


एक प्यारा सा गॉव , जीस मे पीपल की छॉव,
छॉव में आशीयॉ था एक छोटा मकॉ था,
छोड़कर गॉव को, उस घनी छॉव को ,
शहेर के हो गए हे, भीड़ में खो गए हे,
वो नदी का किनारा, जिसपे बचपन गुजारा,
वो लडक्-पन दीवाना, रोज़ पनघट पे जाना,
फिर जब आयी जवानी, हो गए हम कहानी,
छोदकर गाव को, उस घनी छाव को............
कितने गेहेरे थे रिश्ते, लोग थे या फरिश्ते,
एक टुकड़ा जमी थी, अपनी जन्नत वही थी,
छोड़कर गाव को उस घनी छाव को........
ये तो परदेश ठेहरा, देश फिर देश ठेहरा ,
हादसों की ये बस्ती, कोई मेला ना मस्ती,

क्या यहा जिंदगी हे, हर कोई अजनबी हे,
छोड़कर गाव को हम, उस घनी छाव को हम.......


एक प्यारा सा गॉव , जीस मे पीपल की छॉव,
छॉव में आशीयॉ था एक छोटा मकॉ था,
छोड़कर गॉव को, उस घनी छॉव को ,
शहेर के हो गए हे, भीड़ में खो गए हे,
वो नदी का किनारा, जिसपे बचपन गुजारा,
वो लदक्-पन दीवाना, रोज़ पनघट पे जाना,
फिर जब आयी जवानी, हो गए हम कहानी,
छोदकर गाव को, उस घनी छाव को............
कितने गेहेरे थे रिश्ते, लोग थे या फरिश्ते,
एक टुकड़ा जमी थी, अपनी जन्नत वही थी,
छोड़कर गाव को उस घनी छाव को........
ये तो प्रदेश थेहरा, देश फिर देश थेहरा ,
हादसों की ये बस्ती, कोई मेला ना मस्ती,
क्या यहा जिंदगी हे, हर कोई अजनबी हे, 
छोड़कर गाव को, उस घनी छाव को,............ 
एक प्यारा सा गॉव , जीस मे पीपल की छॉव,
छॉव में आशीयॉ था एक छोटा मकॉ था,
छोड़कर गॉव को, उस घनी छॉव को ,
शहेर के हो गए हे, भीड़ में खो गए हे,
वो नदी का किनारा, जिसपे बचपन गुजारा,
वो लदक्-पान दीवाना, रोज़ पनघट पे जाना,
फिर जब आयी जवानी, हो गए हम कहानी,
छोदकर गाव को, उस घनी छाव को............
कितने गेहेरे थे रिश्ते, लोग थे या फरिश्ते,
एक टुकड़ा जमी थी, अपनी जन्नत वही थी,
छोड़कर गाव को उस घनी छाव को........
ये तो प्रदेश थेहरा, देश फिर देश थेहरा ,
हादसों की ये बस्ती, कोई मेला ना मस्ती,
क्या यहा जिंदगी हे, हर कोई अजनबी हे, 
छोड़कर गाव को, उस घनी छाव को,............ 




Monday, 9 April 2012


हालात मै-कदे के, करवट बदल रहे हे,
शाकी बहेक रहा हे मै-कश समहल रहे हे,
किसको बताये कबसे, हम जिंदगी के राही....
फूलों की आरज़ू में, काँटों पे चल रहे हे,
तुम सोख से मनाओ, जश्ने बहार यारों,
इस रोशनी से लेकिन, कुछ घर तो जल रहे हे,
पेहले तो मेरी कश्ती तूफान में छोड़ आए,
साहिल से अब ना जाने क्यूँ हाथ मल रहे हे,
ऐ हम सफर ये शायद , तुजको ख़बर नही हे,
कुछ हादसे भी मेरे, हमराह चल रहे हे,
कितने ग़मों को हमने, हँसकर छुपा लिया हे.,
कुछ गम"अमीर" लेकिन, अश्कों में ढल रहे हे,

अजनबी शहेर के अजनबी रास्ते मेरी तन्हाइ पर मुस्कुराते रहे,
में बहोत देर तक यूँ ही चलता रहा, तुम बहोत देर तक साथ आते रहे,
जहर मिलता रहा, जहर पीते रहे, रोज़ जीते रहे रोज़ मरते रहे,
जिंदगी भी हमे आजमाती रही, ओर हम भी उसे आजमाते रहे,
ज़ख्म जब भी जेहनो दिल पर लगा, जिंदगी की तरफ़ एक दरीचा खुला,
हम भी गोया किसी साज़ के तार हे, चोट खाते रहे  गुण -गुनाते  रहे,
सख्त हालत के तैज़ तूफान में, घिर गया था हमारा जूनूने  वफ़ा,
हम चरागे तमन्ना जलाते रहे, वो चरागे तमन्ना बुज़ाते रहे,


मैंने पूछा था एक सितारे से, इंतेहा भी हे सफर की कोई,
सुनकर मेरे सवाल को शबनम फूट-फूटकर रोई
भूल जाना था तो फिर अपना बनाया क्यूँ था.?
तुमने उल्फत का यकीन मुजको दिलाया क्यूँ था.?
एक भटके हुए राही को सहारा देकर,,
जूठी मंज़िल का निशा तुमने दिखाया कयूँ था.?
ख़ुद ही तूफान उथाना था मुहोब्बत में अगर,
डूबनेसे मेरी कस्ती को बचाया क्यूँ  था...?
जिसकी ताबीर अब अश्कों के सिवा कुछ भी न
ख्वाब ऎसा मेरी आँखों को दिखाया क्यूँ था,?
अपने अंजाम पे क्यूँ अब हो पशेमान शबा,
एक "बे-दर्द" से दिल तुमने लगाया क्यूँ  था...

मैंने पूछा था एक सितारे से, इंतेहा भी हे सफर की कोई,
सुनकर मेरे सवाल को शबनम फूट-फूटकर रोई
भूल जाना था तो फिर अपना बनाया क्यूँ था.?
तुमने उल्फत का यकीन मुजको दिलाया क्यूँ था.?
एक भटके हुए राही को सहारा देकर,,
जूठी मंज़िल का निशा तुमने दिखाया कयूँ था.?

ख़ुद ही तूफान उथाना था मुहोब्बत में अगर,
डूबनेसे मेरी कास्ती को बचाया क्यूँ  था...?

जिसकी ताबीर अब अश्कों के सिवा कुछ भी न
ख्वाब ऎसा मेरी आँखों को दिखाया क्यूँ था,?
अपने अंजाम पे क्यूँ अब हो पशेमान शबा,
एक "बे-दर्द" से दिल तुमने लगाया क्यूँ  था...?


Saturday, 7 April 2012


में यूँ ही गुझार देता, शबे गम सम्हल-सम्हल के,
तुम्हे क्या मिला बताओ, मेरी जिंदगी बदलके,

बड़े बे-वफ़ा हे आँसू, सरे बज़्म आज छलके,
मेरी आरजू को लूटा, मेरी चस्मे नं में पलके,

किसी बे-सहारा दिल को, ना सताओ इस तरहा से,
कही आह कर ना बैठे, कोई बाद-नसीब जलके,

में इसी लिए खींचा हूँ, के उन्हें भी आए गुस्सा,
वो उलट दे क!श पर्दा, मेरी बे-रुखी से जलके,
करके बरबाद मुजे  उसने ये फरमाया है,
जश्न मना ये तेरे प्यार  का सरमाया है,
किस्मत ने दी हे मुजे ये कैसी विरानी,
जहा फुल तो फुल खार भी मुरझाया हे,
बनाके  दुनिया जो भूल की हे तूने,
तेरे कितने मसलों को हमने सुलझाया हे,
कितने होंगे ओर दर-बदर तेरी चाहत में,
कितनो ने यहा तेरा नक्शे-कदम पाया हे
गर होंसलावर होता ,तो यु पर्दा-दारी न करत्ता,
बनाके हमको क्यू, तूने मुँह छुपाया हे,

करके बरबाद मुजे  उसने ये फरमाया है,
जश्न मना ये तेरे प्यार  का सरमाया है,
किस्मत ने दी हे मुजे ये कैसी विरानी,
जहा फुल तो फुल खार भी मुरजाया हे,
लाज राखो गीरधारी..........लाज राखो गीरधारी..,
लाज राखो गीरधारी........लाज राखो गीरधारी...,
जैसी लाज राखी अर्जुन की, भारत युद्धे-वनजारी,
सारथी हो के रथ को हाक्यौ, चक्र सुदर्शन धारी.,
जैसी लाज राखी द्रौपदी की, होने ना दीनी उघारी,
खींचत खींचत दो भुज थाके, दु;साशन पचहारी,
चिर बढायो मुरारी,......
सूरदास की लाज राखो प्रभु, अब को हे रखवारी,
राधे-राधे  श्रीधर प्यारो, श्री रीषभान दुलारी,.......

Thursday, 5 April 2012

मिलें तुम तो खिले दिल के फुल,
दिल मेरा बस में नही, जुले सा रहा जुल,
जिंदगी हो जैसे दिन भर की तपिश,
तेरी आगोश हे शीतल चाँदनी कुल-कुल,....
अब इंतज़ार कहा ?, हे वस्ल की सब रातें,
घंटों  होती रहेगी, प्यार की ये बातें,
दरमियॉ हमारे अब दुरीया ना हो,
ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हो,मजबूरियाँ ना हो,
माथे पे सींदुरी  जो चढ गई तेरी धुल,....
अब तो साथ मे ही जिना,हे साथ में मरना,
दिल को गवारा नही, एक-दूजे का बिछड़ना,
तुम चन्दा में चाँदनी बन जाउ तेरी,
तुम दीपक हो तो, पाती बन जाउ तेरी,

हो गलतियांएक-दुसरे की हम जाएँ भूल,.....

Sunday, 1 April 2012

था, गलियों से गुजरा,वो तेरा नाम लेकर,
कितने ग़मों से हारा, टूटे दिल पे ह!ठ रखकर,
सेहरा" में उसके कुछ ,"असबाब" गिरे हुए थे,
और जालिम मरा था, तेरा नाम लिखकर,
में किसे सुनाऊँ,अपने दिल का हाल,
मेरी बरबादी लेती हे तेरा नाम,...तेरा नाम...
बे-वफाइ दिले बे-वफ़ा की, देखिये,
लेता है बदले खुदा के तेरा नाम, तेरा नाम...तेरा नाम...........
रेत से मेरे घरौंदे कैह् उठे,
अब की आँधी पर, लिख्खा है,तेरा नाम, तेरा नाम..तेरानाम,,,,,,,,
जिंदगी जब बे-खुदी से भर गई,
बे-खुदो में भी मिला हे तेरा नाम.....तेरा नाम...तेरा ..नाम.......

जिंदगी तो जिन्दगी मेरी "मुकेश"
मौत पर भी अब लिख्खा हे तेरा नाम,....तेरा नाम.....

था, गलियों से गुजरा,वो तेरा नाम लेकर,
कितने ग़मों से हारा, टूटे दिल पे हठ रखकर,
सेहरा" में उसके कुछ ,"असबाब" गिरे हुए थे,
और जालिम मरा था, तेरा नाम लिखकर,
में किसे सुनाऊँ,अपने दिल का हाल,
मेरी बरबादी लेती हे तेरा नाम,...तेरा नाम...
बे-वफाइ दिले बे-वफ़ा की, देखिये,
लेता है बदले खुदा के तेरा नाम, तेरा नाम...तेरा नाम...........
रेत से मेरे घरौंदे कैह् उठे,
अब की आँधी पर, लिख्खा है,तेरा नाम, तेरा नाम..तेरानाम,,,,,,,,
जिंदगी तो जिन्दगी मेरी "मुकेश"
मौत पर भी अब लिख्खा हे तेरा नाम,....तेरा नाम.....mukeshjoshi