Tuesday, 10 April 2012


एक प्यारा सा गॉव , जीस मे पीपल की छॉव,
छॉव में आशीयॉ था एक छोटा मकॉ था,
छोड़कर गॉव को, उस घनी छॉव को ,
शहेर के हो गए हे, भीड़ में खो गए हे,
वो नदी का किनारा, जिसपे बचपन गुजारा,
वो लडक्-पन दीवाना, रोज़ पनघट पे जाना,
फिर जब आयी जवानी, हो गए हम कहानी,
छोदकर गाव को, उस घनी छाव को............
कितने गेहेरे थे रिश्ते, लोग थे या फरिश्ते,
एक टुकड़ा जमी थी, अपनी जन्नत वही थी,
छोड़कर गाव को उस घनी छाव को........
ये तो परदेश ठेहरा, देश फिर देश ठेहरा ,
हादसों की ये बस्ती, कोई मेला ना मस्ती,

क्या यहा जिंदगी हे, हर कोई अजनबी हे,
छोड़कर गाव को हम, उस घनी छाव को हम.......

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