मन में उठा ये, कोला-हल कैसा,
मन तो है, हिरण चंचल जैसा,
मन के हाथों में मत दो अपनी बाग-डोर,
भगाता रहेगा ये है ,चित्त चोर,
मन बावरा है, मन ही जोगी,
उसकी हसरते कही पूरी नही होगी,
छोटी बड़ी आरजू का मन भोगी
कभी -कभी बे-मतलब मन रोगी,
क्या चाहता है, ये ख़ुद ही ना जाने,
लाख समजाओ पर ये ना माने,
अजब से बजती है, इसमे जब कोई धुन,
ऐसी ही होती है ये मन कि उधेदबुन,
मन तो है, हिरण चंचल जैसा,
मन के हाथों में मत दो अपनी बाग-डोर,
भगाता रहेगा ये है ,चित्त चोर,
मन बावरा है, मन ही जोगी,
उसकी हसरते कही पूरी नही होगी,
छोटी बड़ी आरजू का मन भोगी
कभी -कभी बे-मतलब मन रोगी,
क्या चाहता है, ये ख़ुद ही ना जाने,
लाख समजाओ पर ये ना माने,
अजब से बजती है, इसमे जब कोई धुन,
ऐसी ही होती है ये मन कि उधेदबुन,
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