जब अंचल रात का लेहराये ओर सारा आलम सो जाए ,
तुम मुजसे मिलाने शम्मा जलकर ताज -महल में आजाना,.................
ये ताज-माहेल जो चाहत की आँखों का सुनहरा मोती हे,
हर रात जहा दो रूहों की खमोशी जिंदा होती हे,
इस ताज के साये में आकर तुम गीत वफ़ा का दोहराना,
ऎसे में तुम मुजसे मिलाने आजाना....
तन्हाइ हे जागी-जागी सी,माहौल हे सोया-सोया हुआ,
जैसे की तुम्हारे ख्वाबों में ख़ुद ताज-महल हे खॊया हुआ,
हो ताज महल का ख्वाब तुम्ही ये "राझ"ना मैंने पेहचाना,
ऎसे में तुम शम्मा,
जो मौत मुहोब्बत में आए, वो जान से बढ़कर प्यारी हे,
दो प्यार भरे दिल रोशन हे, दो रात बहोत अंधीयारी हे,
तुम रात के इस अंधीयारे में बस एक जलक दिखला जाना,................
एसेमे तुम मुजसे मिलाने ताज -महल में आजा
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