Wednesday, 30 January 2013


शम्म; की तरहा पिघलते हुए दिल देखे हे,
अश्क बन बन के निकलते हुए दिल देखे हे,,
तुने देखेही नही गर्मी-ए-रुखसार-ए-हया,
हमने इस आग में जलते हुए दिल देखे हे,
जो भी केहना वहां मेरी जुबानी केहना,
लोग कुछ भी कहे तुम आग को पानी केहना,
आज वो शख्स जमाने में हे यक्ता केहदो,
कल कोई दूसरा मिल जाए तो शानी केहना,,,
ये अगर पलकों पे थम जाए तो, आंसू कहीयो,
ओर बेह जाए तो दरीया की रवानी केहना,,,,,
जितना जी चाहे इसे आज हकीकत केहलो,
कल मेरी तरहा इसे तुम भी कहानी केहना,,,,,

टूटते लम्हों को मुठ्ठी में जकडने वालों,
क्या मिलेगा तुम्हे परछाई से लड़ने वालों,,,,,
मेरे तलवों ने तो काँटों की रीफाकत चुनली,
कुछ नही राह् में अब पाँव रगड़ने वालों,,,,,,,
अपने दामन की सियाही तो मिटा लो पेहले,
मेरी पेशानी पे रुस्वाइया जड़ने वालों,,,,,
मेरी बातें ना सुनो अपना कहा तो मानो,
वक्त के सामने जुक जाओ अकडने वालों,,,,,,
उम्रभर बैठ के रोना कोई आसान नही,
अपनी यादें भी लिए जाओ बिछडने वालों,,,

Tuesday, 29 January 2013


क्या कहूँ दिल पे कयामत सी गुजर जाती हे,
इत्तेफाकन जो किसी आंख में आँसू चमके,,,
कितनी गजलों को तेरे नाम से मनसूब किया,
मेरी ख्वाहिश थी भरे शहेर में एक तू चमके,,,,
क्या जमाना था के हम रोज़ मिला करते थे,,
रात भर चाँद के हमराह फिरा करते थे,,,,,
कर दीये आज जमाने उन्हें भी मजबूर,
कभी ये लोग मेरे दुःख की दवा करतें थे,,,,,
देखकर वो हमे चुप-चाप निकल जाता हे,
कभी उस शख्स को हम प्यार किया करते थे,,,,
जहां तन्हाइया घर छोड़ के सो जाती हे,,,
इन मकानों में अजब लोग रहा करते थे,,,,
वो गजलवालों को अजीब समजते होंगे,,
प्यार केहते हे जिसे खूब समजते होंगे,
कितनी मिलती हे तेरी सूरत,
लोग तुजको मेरा मेहबूब समजते हे,,,,,

Sunday, 27 January 2013


तलाशते ही रह गए,.
हो गए किस क़दर दर-ब-दर,,
समजाते ही रह गए,
ना समजे  जिंदगी है अजीब सफ़र,,
हम दूर निकल आए,
मंजील को तलाशते हुए,
पीछे रह गए सब,
अहबाब और हमारा ही घर,,,,,,,
ये कैसी तलाश है हमारी,
जो कभी थमती ही नहीं,
रास्ते ही रास्ते हे जहां,
ना मंज़िल हे ना कोई घर,,,,,,,
खुदा भी हमीं से करे हे,
मज़ाक़ नहीं तो और क्या है,
हम ख़ुद ही को तलाशते रहे,
ओर ख़ुद से ही हे बेख़बर,,,,,,मुकेश जोशी,,,,

Saturday, 26 January 2013


हे कहा का इरादा तुम्हारा सनम, किसके दिल को अदा ओ से बहेलाओगे,
सच बताओके इस चाँदनी रात में किससे वादा किया हे कहा जाओगे,,

परवाने तो जल जाते हे रोशनी की तलब में,
ए शम्म; तेरे ज़हन की कालीप देख् खाक हो गए,


देखो ना तुम हो गए िकस क़दर, दर-ब-दर,
हम ना कहते थे के िजदगी है, अजीब सफ़र ।

तुम दूर निकल गए, मंिजल को तलाशते हुए,
पीछे रह गए सब अहबाब और तुम्हारा ही घर।

ये कैसी तलाश है तुम्हारी, जो कभी थमती ही नहीं,
दूर ले गई हम से, हमारा मंज़िल-ए-हमसफ़र ।

ये हमसे िकस्मत का मज़ाक़ नहीं तो और क्या है,
हम तुम्हें तलाशते रहे और तुम हो ख़ुद से ही बेख़बर ।

samajaate  



Thursday, 24 January 2013


लिख दिया अपने दर पे किसीने,
इस जगह प्यार करना मना हे,
प्यार  गर हो भी जाए किसी को,
इसका इज़हार करना मना हे,,,
उनकी महफिल में जब कोई जाए,
पेहले नजरे वो अपनी जुकाये,
वो सनम जो खुदा बन गए हे,,
उनका दीदार करना मना हे,,,,,,

जाग उठेंगे तो आहे भरेंगे,
हुश्न वालों को रुस्वा करेंगे,
सो गए हे तो फुरकत के मारे,
उनको बेदार करना मनाहे,
हमने की अर्ज ए-बन्दा-परवर,
क्यूँ सितम धा रहे हो ये हम पर,
बात सुनकर हमारी वो बोले,
हमसे तकरार करना मना हे,

सामने जो खुला हे जो मौका,
खा ना जाना कतिल उनका धौखा,
अब भी उस गली में,
सौख-ए- दीदार करना माना हे,




मेरे रस्क-ए-कमर तूने पेहली नजर,
जब नजर से मिलाइ मजा आ गया,,,,
बर्क सी गिर गई, काम ही कर गइ,
आग ऐसी लगाई , मजा आ गया,,,,,

जाम में घोल कर हुश्न की मस्तियां,
चाँदनी मुस्कुराईं मजा आगया,
चाँद के साये में ए मेरे साथिया,
तूने ऐसी पिलाइ मजा आ गया,

नशा शीशे में अँगड़ाई लेने लगा,
बज्म-ए-रींदा मे सागर खनक ने लगा,
मै-कदे पे बरसने लगी मस्तियां .
जब घटा घीर के छाई ,मजा आ गया,,,,,
बे-हिजाबाना वो सामने आ गये,,
ओर जवानी से जवानी टकरा गई,
आँख उनकी लड़ी यूँ मेरी आँख से,
देखकर ये लड़ाई मजा आ गया,

आँख में थी हया, हर मुलाकात पर,
सुर्ख आरीद हुए वसाला की बात पर,
उसने शरमाके मेरे सवालात पे,
ऐसे गरदन जुकाइ मजा आ गया,
शेख साहिब का ईमान बिक ही गया,
देखकर हुश्ने साकी पिघल ही गया,
आज से पहेले वो कितने मगरुर थे,
लूट गई पारसाइ मजा आ गया,
ए फना शुक्र हे आज बाद -ए-फना,
उसने रखली मेरे प्यार की आबरू,
अपने हाथों से उसने मेरी कब्र पर,
चादर-ए-गुल चढ़ाई ,मजा आ गया,



Tuesday, 22 January 2013


रिसते हुए जख्मो से लहू ने,
उसे दिल में उतर ने ना दिया,
में तो मरना चहता था लेकिन,
कम-बख्त सांसो ने मरने ना दिया, mukesh joshi,,

दुःख की लहेर ने छेड़ा होगा,,,,,
याद ने कंकर फेंका होगा,,,,,,,
आज तो मेरा दिल केहता हे,
तु इस वक्त अकेला होगा,,,,
मेरे चूमे हुए हाथो  से,
भौंरों को खत् लिखता होगा,,,,,
यादों की जलती शबनम से,
फुल सा मुखड़ा रोया होगा,,,,,,,,,
मोती जैसी शकल बना कर,
आयने में वो तकता होगा,,,,,,,,,
में तो आज बहोत रोया हूँ,
तू भी शायद रोया होगा,,,,,,,,
"नासिर" तेरा मीत पुराना,
तुजको याद तो आता होगा,,,,,,,,



Monday, 21 January 2013


तेरे आने का धौका सा रहा हे,,,,,,,
दीया सा रात भार जलता रहा हे,,,,,,
अजब हे रात से आँखों का आलम,
ये दरीया रात भर चढ़ता रहा हे,,,,,,
सुना हे रात भर बरसा हे बादल,
मगर वो शहेर जो प्यासा रहा हे,,,,,
वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का,
जो पिछली रात से याद आ रहा हे,,,,,

किसे ढ़ूँढोगे इन गलियों में नासिर ,
चलो अब घर चले दिन जा रहा हे,,,,,


Tuesday, 15 January 2013


गज़ब किया तेरे वादे पे एतबार किया,,,,,,
तमाम रात कयामत का इंतज़ार किया,,,,,
हसा-हसा के सब-ए-वस्ल अश्क-वार किया,
तसल्लीया मुजे दे-देकर बे-करार किया,,,,,,,,
हम ऎसे मेहरे नजारा ना थे जो होंश आता,
मगर तुम्हारे तगाफुल ने होंशीयार किया,,,

Friday, 11 January 2013


आँखों के अश्क में वो बेहती तसवीर बन गई,
जिंदगी जिसे माना वो दो बूंद नीर रह गई,

बडे बे-शर्म होते हे आंसु आँखों से  बेहते हे,
ब्लैक-बोर्ड की तरह हमसे गाल पुछ्वाते हे,,

में रोया परदेश में भीगा माँ का प्यार,
दुःख ने दुःख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार,
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार,
आँखों भर आकास हे बाँहों भर संसार,
लेके तन के नाप को घूमें बस्ती गांव,
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाव,
सबकी पुजा एक् सी, अलग-अलग हर रीत,
मस्जिद जाए मौलवी, कोयल गाये गीत,
पुजा घर में मूर्ति मीराँ के संग श्याम,
जिसकी जितनी चाकरी उतने उसके दाँम,
नदियां सींचें खेत को, तोता कुतरे आम,
सूरज ठेकेदार सा सब को बाँटे काम,,
सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर,
जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फ़कीर,
अच्छी संगत बैठकें सेंगी बदले रूप,
जैसे मिलके आम से मीठी हो गई धूप,,,
सपना जरना नींद का जागी आँखें प्यास,
पाना खोना खोजना, सांसो का इतिहास,
चाहे गीता बांचीये, या पढिये कुरान,
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान,,,,,


Wednesday, 9 January 2013


सब ने बहोत सुनाया था ,एक तू ही था बाकी,
तुजसे भी क्यूँ गिला करे, तुजे समजे हम आखरी साकी,,
गले तक भरा हे जाम-ए-जहर हमने,


सब ने बहोत सुनाया था ,एक तू ही था बाकी,
तुजसे भी क्यूँ गिला करे, तुजे समजे हम आखरी साकी,,
गले तक भरा हे जाम-ए-जहर हमने,


तुम्हे दिल्लगी भुल जानी पड़ेगी,
मुहोब्बत की राहो में आ कर तो देखो,,,,
तड़प ने पे मेरे ना फिर तुम हँसोगे,
कभी दिल किसी से लगाकर तो देखो,,,,,,

तुम्हे दिल्लगी भुल जानी पड़ेगी,
मुहोब्बत की राहो में आ कर तो देखो,,,,
तड़प ने पे मेरे ना फिर तुम हँसोगे,
कभी दिल किसी से लगाकर तो देखो,,,,,,
खून रुलायेगी ये लगी दिल की,
खेल समजो ना दिल्लगी दिल की,,
वफ़ा ओ की हमसे तवक़्क़ो नही हे,
मगर एक बार आजमा कर तो देखो,
जमाने को अपना बनाकर तो देखा,
हमे भी तुम अपना बनाकर तो देखो,,,,


Tuesday, 8 January 2013


जोड़ लगते गए फसाने में,
राज खुलते गए छुपाने में,
रूठने का सबब तो तुम जानो,
हम तो मशरुफ हे मनाने में,
तूने तिनके समज के फूँक दिया,
मेरी दुनिया थी आशीयाने में,,,,,,,,,,,,
करार लूंट लिया बे-करार छोड़ गए,
बहार ले गए याद-ए-बहार छोड़ गए,
हमारी तिश्नगी का ना कुछ खयाल किया,
उम्र-भर के लिये अश्क-वार छोड़ गए,,,,,,,,,,

बे-ख़ुद किए देते हे अंदाज़-ए-हिजाबाना,
आ दिल में तुजे रखलू, ए-जल्वा-ए-जनाना,,,,,,


परिशा हो के मेरी खाक,
आख़िर दिल ना बन जाए,
जो मुश्किल अब हे या रब,
फिर वोही मुश्किल ना बन जाए,
उरूज-ए-आदम-ए-खाकी से,
अंजुम सहमे जाते हे,
के ये टूटा हुआ तारा,
माह-ए-‍तमिल ना बन जाए,
मेरा मकाम अर्स था लेकिन अब फर्स हे,
आसमां से उतारा गया,
में तो आ-दम,
आ-दम ,से हुई ना फरमानी,
जन्नत से उथा दाना-पानी,
दाना होकर नादां बना,
एक दाने पे एक दिन नादान,
खता शैतान की आदम को,
खींचा पाव से जन्नत से,
ना था कुछ तो खुदा था,
कुछ ना होता तो खुदा होता,यहा होना ना होना हे,
ना होना में एहले होना हे
ना था कुछ तो खुदा था,
कुछ ना होता तो खुदा होता,
डुबोया मुजको होने ने,
ना में होता तो क्या होता,
यहा होना ना होना हे,
अगर पेहरे माहानी से ,
ये कतरा जुदा ना होता,
जिंदगी मौत का निशाना हे,
सबको यहा से एक दिन जाना हे,







Sunday, 6 January 2013


दोस्तों की शिकायत करूँ में,
ये भी मुजको गवारा नही हे,,,,
दोस्तों ने करम वो किए हे ,
जिन्दगी की तमन्ना नही हे,,,,,,
सोचकर बे-वफ़ा मुजको कहिये,
खुल ना जाए भरम आपका भी,
आजमाया हे दुनिया को मैंने,
आपने मुजको परखा नही हे,
हो के बेताब मैयत पे मेरी,
तुम ये क्यूँ बे-नकाब आ गये हो,
उम्र भर जिससे परदा किया था,
आज क्यूँ उस से परदा नही हे,

Wednesday, 2 January 2013


तेरे गम को जां की तलाश थी,
तेरे जां-निसार चले गए,,,,,,,
तेरी राह् में करते थे सर तलब,
सर-ए-राह्-गुजार चले गए,,,,,,,,
ये हमीं थे जिनके लिबास पर,
सर-ए-राह् सियाही लिख्खी गइ,
ये ही दाग थे जो सजाके हम,
सर-ए-बज़्म-ए यार चले गए,,,,,,,,,,
तेरी कच अदाइ से हार के,
सब-ए-इंतज़ार चली गई,
मेरे जब्त-ए-हाल से रूठ के,
मेरे गम-गुसार चले गए,
ना सवाल-ए-वस्ल, ना अर्ज-ए-गम,
ना हिकायते, ना शीकायते,
तेरे एहेद में दिल-ए-जार की,
सारे इख्तेयार चले गए,,,,,,,,,
ना रहा जुनून-ए रुख-ए-वफ़ा,,,
ये रसम ये डार करोगे क्या,,?

तेरे गम को जां की तलाश थी,
तेरे जां-निसार चले गए,,,,,,,
तेरी राह् में करते थे सर तलब,
सर-ए-राह्-गुजार चले गए,,,,,,,,
ये हमीं थे जिनके लिबास पर,
सर-ए-राह् सियाही लिख्खी गइ,
ये ही दाग थे जो सजाके हम,
सर-ए-बज़्म-ए यार चले गए,,,,,,,,,,
तेरी कच अदाइ से हार के,
सब-ए-इंतज़ार चली गई,
मेरे जब्त-ए-हाल से रूठ के,
मेरे गम-गुसार चले गए,
ना सवाल-ए-वस्ल, ना अर्ज-ए-गम,
ना हिकायते, ना शीकायते,
तेरे एहेद में दिल-ए-जार की,
सारे इख्तेयार चले गए,,,,,,,,,
ना रहा जुनून-ए रुख-ए-वफ़ा,,,
ये रसम ये डार करोगे क्या,,?

जिन्हें  जुर्म-ए-इश्क पे नाज़ था,
वो गुनाह्-गार चले गए,,,,,,,,,,