Friday, 29 June 2012

आज तुमसे दूर् होकर, ऐसे रोया मेरा प्यार,
चाँद रोया साथ मेरे, रात रोई बार-बार,
कुछ तुम्हारी बंदिशें है, कुछ हे मेरे दायरे,
जब मुकद्दर ही बने दुश्मन तो कोई क्या करे,
इस मुकद्दर पर किसीका, क्या हे आख़िर इख्तेयार,
चाँद रोया साथ मेरे...............
हर तमन्ना से जुदा में, हर खुशी से दूर् हूँ,
जी रहा हूँ , क्यू की जिने के लिए मजबूर हूँ,
मुजको मरने भी ना देगा ये तुम्हारा इंतज़ार,
चाँद रोया साथ मेरे...............

Thursday, 21 June 2012

दौलत की जूठे नशे में हो चूर,
गरीबों की दुनिया से रेहते हो दूर्,
अजी एक दिन ऐसा आयेगा,
सब  माटीमें मिल जयेगा,
माटी ही औढन, माटी ही बिछावन,
माटी का तन बन जयेगा,
माटी में सब मिल जयेगा,
ऊँचे आसमान से भी उन्ची तेरी आश हे,
पर कभी सोचा नही, गिनती की तेरी साँस हे,
इसका तू हिसाब कर, अँगूठा उंगलीओ पे धर,
कितनी खर्च कर रहां भलाई में,
कितनी तू लगा रहा बुराई मे,
भलाई का फल रह जयेगा,
ऊँची हवेली ये ऊँचे महल,
पल में भर् में जायेंगे पगले बदल,
ले तु किसीकी दुआ ओ का फल.
बड़ी से तू तल, ओर नेकी पे चल,
जैसा बोयेगाँ वैसा पायेगा,
बाकी माटी में सब मिल जयेगा,
दौलत की जुथे नशे में हो चूर,
गरीबों की दुनिया से रेहते हो दूर्,
अजी एक दिन ऐसा आयेगा,
सब माती में मिल जयेगा,
माटी ही औढन, माटी ही बिछावन,
माटी का तन बन जयेगा,
माटी में सब मिल जयेगा,
ऊँचे आसमान से भी उन्ची तेरी आश हे,
पर कभी सोचा नही, गिनती की तेरी साँस हे,
इसका तू हिसाब कर, अँगूठा उंगलीओ पे धर,
कितनी खर्च कर रहां भलाई में,
कितनी तू लगा रहा बुराई मे,
भलाई का फल रह जयेगा,
ऊँची हवेली ये ऊँचे महल,
पल में भर् में जायेंगे पगले बदल,
ले तु किसीकी दुआ ओ का फल.
बड़ी से तू तल, ओर नेकी पे चल,

जैसा बोयेगाँ वैसा पायेगा,
बाकी माटी में सब मिल जयेगा,

Monday, 18 June 2012

शुशिल जी , ये राजकारण की मंडी हे,
 दीखती सफेद उतनी ही गंदी हे.
यहा कोई किसी का सगा नही,
ऎसा नही कोई जिसने, किया दगा नही,
यहा हर नर बस मदारी हे,
हर नारी देखो मदारीन हे,
हर एक अपनी -अपनी बिन बजाते हे,
वोटर को अपनी धुन पर नाचते हे,
वेश्या भी तो एक रात किसी की होती हे,
अपने असुलो का बो़ज वो भी ढोतीं हे,
इस मंडी में आइडीयोलोजी कहा चलती हे,
ये वेश्याघर एसा हे जहां खरीद फरौख ही चलतीहे,
सब के सब सत्ता के दलाल यहा बैठे हे,
करोड़ों में नही अब तो अरबों पे ऐंठे हे,
अब कहां रही इनमें ईमान दारी भाइ,

ईमानदार की तो इन्होंने धोती तक उतरवाई,
लगता हे अब वोटर के तन कच्छा ही बचेगा,
नंगे भारत का सपना अब उनका खूब रचेगा,

Saturday, 16 June 2012

बहोत पेहले से,उन कदमो की,आहत जान लेते हे,
तुजे ए-जिंदगी, हम दूर् से, पेहचान लेते हे,
तबीयत अपनी गभराती हे,जब सुन-सान रातों में,
हम ऐसे में, तेरी यादों की, चादर तान लेते हे,
मेरी नजरे ऐसे काफिरों का जानो ईमान हे,
निगाहे मिलते ही ,जो जान ओर ईमान लेते हे,
"फिराक" अकसर बदल कर भेष,मिलता हे कोई कातिल,
कभी हम जान लेते हे, कभी पेहचान लेते हे,
बहोत पेहले से,उन कदमो की,आहत जान लेते हे,
तुजे ए-जिंदगी, हम दूर् से, पेहचान लेते हे,
तबीयत अपनी गभराती हे,जब सुन-सान रातों में,
हम ऐसे में, तेरी यादों की, चादर तान लेते हे,
मेरी नजरे ऐसे काफिरों का जानो ईमान हे,
निगाहे मिलते ही ,जो जान ओर ईमान लेते हे,
"फिराक" अकसर बदल कर भेष,मिलता हे कोई कातिल,
कभी हम जान लेते हे, कभी पेहचान लेते हे,
बहोत पेहले से,उन कदमो की,आहत जान लेते हे,
तुजे ए-जिंदगी, हम दूर् से, पेहचान लेते हे,
तबीयत अपनी गभराती हे,जब सुन-सान रातों में,
हम ऐसे में, तेरी यादों की, चादर तान लेते हे,
मेरी नजरे ऐसे काफिरों का जानो ईमान हे,
निगाहे मिलते ही ,जो जान ओर ईमान लेते हे,
"फिराक" अकसर बदल कर भेष,मिलता हे कोई कातिल,
कभी हम जान लेते हे, कभी पेहचान लेते हे,
बहोत पेहले से,उन कदमो की,आहत जान लेते हे,
तुजे ए-जिंदगी, हम दूर् से, पेहचान लेते हे,
तबीयत अपनी गभराती हे,जब सुन-सान रातों में,
हम ऐसे में, तेरी यादों की, चादर तान लेते हे,
मेरी नजरे ऐसे काफिरों का जानो ईमान हे,
निगाहे मिलते ही ,जो जान ओर ईमान लेते हे,
"फिराक" अकसर बदल कर भेष,मिलता हे कोई कातिल,
कभी हम जान लेते हे, कभी पेहचान लेते हे,

Friday, 15 June 2012

ठीक कहा शुशिल जी आपने,
थका दीया हे , आपको सर के अभिश्राप ने,
रावण के भी होते थे कभी दस सर,
आप के तो पता नही,
कितनो के हो आप सर,
रोज़ -रोज़ का ये नजारा हे,
कॉलेज में कई छात्रों ने पुकारा हे,
सर!!1  किसी दिन उबके ,
आप नींद में बड-बडायेंगे,
फिर भी ये ब्च्चे आपको सर ही बुलायेंगे,
आज का सर गुरु जी पे हो गया हे भारी,
ओर गुरु भी आज सर के हो गए आभारी,
शाहरुख के किसीने सर कैह् दीया,
बना बैठा ख़ुद को रा-वन,
लोगो ने भी प्रेम से कैह् दीया,जां- बन,
सर भी आज -कल खूब पढ़ें-लिख्खे हे,
क्लास में क्या नही पढ़ाना,
बा-खुबी जानते हे,
ट्यूशन जॉइंट करलो,
वर्ना सर को धोते रह जाओगे,
क्लास में जो ना पढ़ा पाया,
वो घर पे ही सिख पाओगे,
अजीब विधा ने बना दीये हे,
कॉलेज और स्कूल,
अच्छा ही था , रहने देते हम गुरुकुल,

Thursday, 14 June 2012


बड़ा ही बे-असर हे,
तभी तो दर-बदर हे,
फकीरी हे एक मस्ती ,
ख़ुदमें ही खुदसे पर हे,
मुहोब्बत को हुनर कहे,
समज में कहीं कसर् हे,
उस्तादगी के "उज" को,
केहता वो कहर हे,
भीडेगे "दास" से क्यूँ वो,
जिनका स्वामीमे बसर हे,


बड़ा ही बे-असर हे,
तभी तो दर-बदर हे,
फकीरी हे एक मस्ती ,
ख़ुदमें ही खुदसे पर हे,
मुहोब्बत को हुनर कहे,
समज में कहीं कसर् हे,
उस्तादगी के "उज" को,
केहता वो कहर हे,
भीडेन्ग "दास" से क्यूँ वो,
जिनका स्वामीमे बसर हे,




गज़ल
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बडा ही बेअसर है
तभी तो दर ब दर है ॥

बडे मासूम दिलकश
निगाहों में ज़हर है ॥

मुहब्बत की न पूछो
यही तो इक हुनऱ है ॥

बडे उस्ताद हैं वे
ज़माने में कहर है ॥

भिडेंगे 'दास' से वे
जुबां जिसकी लचर है ॥
शुशिल जी, चाँद को, चाँदनी को,
तारों को , सय्यारो को,
देखना लिखवालाते नसीब में,
बहारो के मौसम फूलों के गुलदस्ते,
काश आपने माँगें होते रब से,
आने के लिए पंडित का घराना चुना,
कर्म के रूप में सरस्वती को देवी बुना,
अब शब्जी , दाल, आता चावल चुन रहे हो,
बैठे बैठे अपने नसीब को धुन रहे हो,
ओर भाग्यवान भी आपने ऐसी ही चुनी,
सरस्वती उपाशक वो भी कर्म अनुरूप गुणी,
अब "उल्लूक"नाम रखने से "चुल्लू "नही भरेगा,
लक्ष्मी जी का वाहन धरे संकट दूर् नही होगा,
अब सरस्वती जी की उपासना छोड़ के,

लक्ष्मी जी के चरण पकड़ लो,
हो शके तो ख़ुद में बनिया गिरि धरलो,
देखो फिर बहरे आयेंगी,
आपको लुभायेगी,
सफेदी आपके बालो से ,
कोषों दूर् चली जायेगी,



Saturday, 9 June 2012

" ये मक़ामे इश्क़ है कौनसा.. कि मिज़ाज सारे बदल गए...
मैं इसे कहूँ भी तो क्या कहूँ.. मिरे हाथ फूल से जल गए ;

तिरी बेरूख़ी की जनाब से.. कई शेर यूँ भी अ़ता हुए ...
के ज़बाँ पे आने से पेशतर.. मिरी आँख ही में मचल गए ;

तिरा मैकदा भी अ़जीब है.. कि अलग यहाँ के उसूल हैं...
कभी बे पिए ही बहक गए.. कई बार पी के सम्हल गए ;

सुनो ज़िन्दगी की ये शाम है.. यहाँ सिर्फ़ अपनों का काम है...
जो दिए थे.. वक़्त पे जल उठे.. थे जो आफ़ताब वो ढल गए ;

कई लोग ऐसे मिले मुझे.. जिन्हें मैं कभी न समझ सका...
बड़ी पारसाई की बात की.. बड़ी सादगी से पिघल गए ;

ज़रा ऐसा करदे तू ऐ ख़ुदा.. कि ज़बाँ वो मेरी समझ सकें ...
वो जो शेर उनके लिए कहे.. वही उनके सर से निकल गए .

Friday, 8 June 2012


मंजिले ख़ुद भटकती हे, रास्ता ढोते-ढोते,
शम्मा ख़ुद ढल जाती हे,सुबहा, होते-होते,
गम किस-किस बात का,यहा करेगा कोई,
उम्र तमाम होती हे,अपनी दास्ता रोते-रोत
कैसा ये जूनून हे, अजब रवानी-ए खून हे,
कोई गीत, जीवन बन गया,आस्था,गाते-गाते
जो सुबहा-शाम बिछ गया,तेरे आस्ता पे,
ख़ुद मझार बन गया,तेरा नक्शे-पा, पाते-पाते,
यूँ ही ख़त्म हो जायेगी,एक दास्ताँ शुरू होते-होते,
जिंदगीया खत्म हो जाती हे,ख़ुद मुक्कमिल होते-होते,
ये उतराव, ये चढ़ाव,
कदम-कदम आगे बढ़ाव,
हर मोड़ हे,आशाओका मेला,
अगले छोर पे निराशा डाले डेरा,
चूर-चूर हो जाते हे,मुसाफिर पाव के छाले ढोते-ढोते,

तन सब का धुला हुआ हे,
अब कुछ मन धुलवओ,
शुशिल जी, अपने नाम के हिसाब से,
शील-वान इनको बनाओ,
भगत सिंह, जगत से चले गए,
देश की खातीर लटक गये,
इनका कहा कोई मरा हे,
बे-इमानी के रोटी पे ,
जिनका कुनबा खड़ा हे,
ऎसे भ्रष्ट नेता ओको,
गंगा में ले-जाकर दुबाओ,
तोप हो या घास हो,
मन-मोहन जहां दास हो,
गॊरी चमड़ी पे मरते हे,
सच्चाई ताक पे धरते हे,
उन्हें जीवन का मूल्य सीखाओ,
आज जो पशु बन घूम रहे हे,
मानव का बहुमूल्य परिवेश धरे हे,
लेकिन करनी उनकी,
मानवता से परे हे,
कुछ ऎसा एहसाँस ,
मानवता का उनमे जगाओ,
अब तो तभी मुँह धोना हे,
पेहले इन पशुओको धोना हे,
चाहे अन्ना टोपी लगाओ,
चाहे कितने अनशन लगवाओ,
अब थोड़ी डन्डा गिरि सीखाओ,
इन काफिरों का भूत भागो,
तन सब का धुला हुआ हे,
अब कुछ मन धुलवओ,
शुशिल जी, अपने नाम के हिसाब से,
शील-वान इनको बनाओ,
भगत सिंह, जगत से चले गए,
देश की खातीर लटक गये,
इनका कहा कोई मरा हे,
बे-इमानी के रोटी पे ,
जिनका कुनबा खड़ा हे,
ऎसे भ्रष्ट नेता ओको,
गंगा में ले-जाकर दुबाओ,
तोप हो या घास हो,
मन-मोहन जहां दास हो,
गॊरी चमड़ी पे मरते हे,
सच्चाई ताक पे धरते हे,
उन्हें जीवन का मूल्य सीखाओ,
आज जो पशु बन घूम रहे हे,
मानव का बहुमूल्य परिवेश धरे हे,
लेकिन करनी उनकी,
मानवता से परे हे,
कुछ ऎसा एहसाँस ,

मानवता का उनमे जगाओ,
अब तो तभी मुँह धोना हे,
पेहले इन पशुओको धोना हे,
चाहे अन्ना टोपी लगाओ,
चाहे कितने अनशन लगवाओ,
अब थोड़ी डन्डा गिरि सीखाओ,
इन काफिरों का भूत भागो,

Wednesday, 6 June 2012

क्या ये भी जिंदगी हे के, राहत कभी ना हो,
एसी भी तो किसीसे, मुहोब्बत कभी ना हो,...
वादा जरुर करते हे, आते नहीं क्भी,
फिर ये भी चहते हे, शीकायत कभी न हो,....
हर किसी हाथ में बिक जाने को तैयार नहीं,
ये मेरा दिल हे, तेरे शहेर का बाज़ार नहीं,
फुल कदमो तले आता हे तो, रुक जाता हूँ,
तेरे जैसी ए जमाने में रफ्तार नहीं,............
चुमकर पलको से, तन्हाइ में जा कर पढले,
तेरे  दीवाने का खत् हे,कोई अखबार नहीं,......
तेरी ज़ुल्फों में सजे जिसका ना जरा कोई,
मेरी नजरों में बयॉबान में गुलजार नहीं,
क्या ये भी जिंदगी हे के, राहत कभी ना हो,
एसी भी तो किसीसे, मुहोब्बत कभी ना हो,...
वादा जरुर करते हे, आते नहीं क्भी,
फिर ये भी चहते हे, शीकायत कभी न हो,....
हर किसी हाथ में बिक जाने को तैयार नहीं,
ये मेरा दिल हे, तेरे शहेर का बाज़ार नहीं,
फुल कदमो तले आता हे तो, रुक जाता हूँ,
तेरे जैसी ए जमाने में रफ्तार नहीं,............
चुमकर पलको से, तन्हाइ में जा कर पढले,
तेरे  दीवाने का खत् हे,कोई अखबार नहीं,......
तेरी ज़ुल्फों में सजे जिसका ना कजरा कोई,
मेरी नजरों में बयॉबान में गुलजार नहीं,

Tuesday, 5 June 2012


या खुदा मुज पर इतना, एहसान ओर करदे,
मेरे दफन का मेरे कफन का इंतेजांम करदे,
की अब महेंगाइ में, बेवक्त मरना भी नही अच्छा,
दो-चार गुनाह्, दो-चार नमाज, हिसाब सब तमाम करदे,

Monday, 4 June 2012

नाज़ुक दिल हे, कोमल तन-मन,
आशा ये हे बड़ी -बड़ी,.........................
इस दुनिया में जीता हे हर -कोई,
जिंदगी मगर हे, घड़ी-दो घड़ी,...............
सागर की गहराई नापु,
आकाश की ऊँचाई,
पागल परिंदे सा ये मन,
जब भी लेता अँगड़ाई,
सारी काइनात देखके उलजे,
आँखें सबकी हे तनी-तनी,.................
अधूरे हे ख्वाब आँखों में,
जागते हे सपने रातों में,
कितने प्यासे सावन हे जेलें,
कितने मौसम् के पतजड ठेले,
लत्ता बनके रह गई जिंदगी,
पेड़ों से लिपट गई, घुली-घुली,...............


अटल मनसूबे हो जहां धरे,
जीवन के कितने थपेडे हो पड़े,
बंजर-हरियाली मन में ना धरे,
गज़ब का हौसला  हे जो लड़े,
टहनी में रस की धार लिए,
कॉपल कोई फूटे जब हरी-भरी,
आज बड़ा दिन हे,
बहोत सारे गधों पे वट-सावित्री ,
के व्रत के साथ पत्‍‌नी या सवार हे,
वैसे तो गधों से धोबी का नाता पूराना हे,
पर उससे कुम्हार भी कभी-क्भी जोड़ बनाता हे,
सबसे पेहले गधा अपनी पत्‍‌नी का गधा होता हे,
सारे संसार में तरहा- तरहा के गधे पड़े हे,
ओर संसार का बौज उठाने पे अड़े हे,
गांव गली रास्ता चौराहा,
पनघट, धोबीघाट, या कथीहारा,
सब के सब गधों पे निर्भर हे,
इसी लिए गधे, आज भी अजर-अमर हे,
गधे ही गुणों के सागर हे,
गधे ही प्राणी ओमे नागर हे,
कुछ -कुछ गधे तरक्की पाते हे,
तब नेता- या अभिनेता बन पाते हे,
कुछ गधे, ख़ुद को गधा केहने से शर्माते हे ,
कुछ ख़ुद को गधा ही बताते हे,
ओर घोड़ों के सामने इतराते हे,
भाइ कुछ भी कहो, अपने गधों से ही नाते हे,
गधों के तो देवी- देवता, ईश्वर भी गुण गाते हे,
कुछ गधे जो "बाबा" बन जाते हे,
सारे भक्तजनों के मन भाते हे,
आज बड़ा दिन हे,
बहोत सारे गधों पे वट-सावित्री ,
के व्रत के साथ पत्‍‌नी या सवार हे,
वैसे तो गधों से धोबी का नाता पूराना हे,
पर उससे कुम्हार भी कभी-क्भी जोड़ बनाता हे,
सबसे पेहले गधा अपनी पत्‍‌नी का गधा होता हे,
सारे संसार में तरहा- तरहा के गधे पड़े हे,
ओर संसार का बौज उठाने पे अड़े हे,
गांव गली रास्ता चौराहा,
पनघट, धोबीघाट, या कथीहारा,
सब के सब गधों पे निर्भर हे,
इसी लिए गधे, आज भी अजर-अमर हे,
गधे ही गुणों के सागर हे,
गधे ही प्राणी ओमे नागर हे,
कुछ -कुछ गधे तरक्की पाते हे,

तब नेता- या अभिनेता बन पाते हे,
कुछ गधे, ख़ुद को गधा केहने से शर्माते हे ,
कुछ ख़ुद को गधा ही बताते हे,
ओर घोड़ों के सामने इतराते हे,
भाइ कुछ भी कहो, अपने गधों से ही नाते हे,
गधों के तो देवी- देवता, ईश्वर भी गुण गाते हे,
कुछ गधे जो "बाबा" बन जाते हे,
सारे भक्तजनों के मन भाते हे,
जब किसी से कोई गिला रखना,
सामने अपने आइना रखना,
यूँ उजालो से वास्ता रखना,
शम्मा के पास ही, हवा रखना,
घर की तामिर चाहे जैसी हो,
इस में रोने की कुछ जगह रखना,
मस्जिदें हे नमाजी ओ के लिए,
अपने घर में कही खुदा रखना,
मिलना जुलना जहां जरूरी हो,
मिलने जुलने का हौसला रखना,