मैंने पूछा था एक सितारे से, इंतेहा भी हे सफर की कोई,
सुनकर मेरे सवाल को शबनम फूट-फूटकर रोई
भूल जाना था तो फिर अपना बनाया क्यूँ था.?
तुमने उल्फत का यकीन मुजको दिलाया क्यूँ था.?
एक भटके हुए राही को सहारा देकर,,
जूठी मंज़िल का निशा तुमने दिखाया कयूँ था.?
ख़ुद ही तूफान उथाना था मुहोब्बत में अगर,
डूबनेसे मेरी कास्ती को बचाया क्यूँ था...?
जिसकी ताबीर अब अश्कों के सिवा कुछ भी न
ख्वाब ऎसा मेरी आँखों को दिखाया क्यूँ था,?
अपने अंजाम पे क्यूँ अब हो पशेमान शबा,
एक "बे-दर्द" से दिल तुमने लगाया क्यूँ था...?
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