कभी कहा ना किसी से तेरे फसाने को,,,,
ना जाने कैसे ख़बर हो गइ, जामाने को,,,,,
सुना हे गैर की महफिल में तुम ना जाओगे,
कहो तो आज सजालु गरीब खाने को,,,,,,
दुआ बहार मांगी तो इतने फुल खिले,
कही जगह ना मिली मेरे आशीयाने को,,,,,
दबा कर कब्र में सब चल दीये, ना दुआ ना सलाम,
जरा सी देर में क्या हो गया जमाने को,,,,,,,
अब आगे इसमे तुम्हारा भी नाम आयेगा,
जो हुक्म हो तो छोड़ दु ये ही फसाने को,,,,,,
"कमर"जरा भी नही तुमको खौफ-ए-रूसवाई,,,
के चाँदनी में चले आज उसे मनाने को,,,,,
