दिल की बात लबों पर लाकर,
अब-तक हम दुख सेहते हे,
हमने सुना था इस बस्ती में,
दिल-वाले भी रेहते हे,
एक हमे आवारा केहना,
कोई बड़ा इल्ज़ाम नही,
दुनिया-वाले दिल-वालों को
ओर बहोत कुछ केहते हे,
बीत गया सावन का महीना,
मौसम ने नजरे बदली,
लेकिन इन प्यासी आँखों से,
अब-तक आँसू बेहते हे,
जिनकी खातिर शहेर भी छोड़ा,
जिनके लिए बदनाम हुए,
आज वोही हमसे बेगाने-बेगाने से रेहते हे,...............
वो जो अभी इस राह्-गुजर से,
चाक गिरेबाँ गुजरा था,उस
आवारा दीवाने को जा-लिब-जा-लिब केहते हे,
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