क्या कहूँ दिल पे कयामत सी गुजर जाती हे,
इत्तेफाकन जो किसी आंख में आँसू चमके,,,
कितनी गजलों को तेरे नाम से मनसूब किया,
मेरी ख्वाहिश थी भरे शहेर में एक तू चमके,,,,
क्या जमाना था के हम रोज़ मिला करते थे,,
रात भर चाँद के हमराह फिरा करते थे,,,,,
कर दीये आज जमाने उन्हें भी मजबूर,
कभी ये लोग मेरे दुःख की दवा करतें थे,,,,,
देखकर वो हमे चुप-चाप निकल जाता हे,
कभी उस शख्स को हम प्यार किया करते थे,,,,
जहां तन्हाइया घर छोड़ के सो जाती हे,,,
इन मकानों में अजब लोग रहा करते थे,,,,
वो गजलवालों को अजीब समजते होंगे,,
प्यार केहते हे जिसे खूब समजते होंगे,
कितनी मिलती हे तेरी सूरत,
लोग तुजको मेरा मेहबूब समजते हे,,,,,
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