तेरे आने का धौका सा रहा हे,,,,,,,
दीया सा रात भार जलता रहा हे,,,,,,
अजब हे रात से आँखों का आलम,
ये दरीया रात भर चढ़ता रहा हे,,,,,,
सुना हे रात भर बरसा हे बादल,
मगर वो शहेर जो प्यासा रहा हे,,,,,
वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का,
जो पिछली रात से याद आ रहा हे,,,,,
किसे ढ़ूँढोगे इन गलियों में नासिर ,
चलो अब घर चले दिन जा रहा हे,,,,,
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