" जैसे होती थी किसी दौर में.. हैवानों में...
बेसकूनी है वही.. आज के.. इंसानों में ;
जल्द उकताते हैं हर चीज़ से.. हर मंजिल से...
ये परिंदों की सी.. आदत भी है.. दीवानों में ;
उम्र भर सच के सिवा कुछ न कहेंगे.. कह कर...
नाम लिखवा लिया.. अब हमने भी नादानों में ;
जिस्म दुनिया में भी.. जन्नत के मज़े लेता रहा...
रूह.. इक उम्र.. भटकती रही.. वीरानों में ;
उसकी मेहमान नवाजी की.. अदाएं देखीं ...
हम भी सकुचाए से बैठे रहे.. बेगानों में ;
नाम.. सूरत तो हैं.. पानी पे लिखी तहरीरें ...
मेरी पहचान रहेगी .. मेरे अफसानों में ;
जो भी होना है.. वो निश्चित है.. अटल है ‘श्रद्धा’...
क्यूँ न कश्ती को.. उतारे कभी... तूफानों में ...."
~~~~~~~~~~~~~~~~ ' श्रद्धा जैन '
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