Thursday, 24 January 2013


मेरे रस्क-ए-कमर तूने पेहली नजर,
जब नजर से मिलाइ मजा आ गया,,,,
बर्क सी गिर गई, काम ही कर गइ,
आग ऐसी लगाई , मजा आ गया,,,,,

जाम में घोल कर हुश्न की मस्तियां,
चाँदनी मुस्कुराईं मजा आगया,
चाँद के साये में ए मेरे साथिया,
तूने ऐसी पिलाइ मजा आ गया,

नशा शीशे में अँगड़ाई लेने लगा,
बज्म-ए-रींदा मे सागर खनक ने लगा,
मै-कदे पे बरसने लगी मस्तियां .
जब घटा घीर के छाई ,मजा आ गया,,,,,
बे-हिजाबाना वो सामने आ गये,,
ओर जवानी से जवानी टकरा गई,
आँख उनकी लड़ी यूँ मेरी आँख से,
देखकर ये लड़ाई मजा आ गया,

आँख में थी हया, हर मुलाकात पर,
सुर्ख आरीद हुए वसाला की बात पर,
उसने शरमाके मेरे सवालात पे,
ऐसे गरदन जुकाइ मजा आ गया,
शेख साहिब का ईमान बिक ही गया,
देखकर हुश्ने साकी पिघल ही गया,
आज से पहेले वो कितने मगरुर थे,
लूट गई पारसाइ मजा आ गया,
ए फना शुक्र हे आज बाद -ए-फना,
उसने रखली मेरे प्यार की आबरू,
अपने हाथों से उसने मेरी कब्र पर,
चादर-ए-गुल चढ़ाई ,मजा आ गया,



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