Saturday, 26 January 2013


हे कहा का इरादा तुम्हारा सनम, किसके दिल को अदा ओ से बहेलाओगे,
सच बताओके इस चाँदनी रात में किससे वादा किया हे कहा जाओगे,,

परवाने तो जल जाते हे रोशनी की तलब में,
ए शम्म; तेरे ज़हन की कालीप देख् खाक हो गए,


देखो ना तुम हो गए िकस क़दर, दर-ब-दर,
हम ना कहते थे के िजदगी है, अजीब सफ़र ।

तुम दूर निकल गए, मंिजल को तलाशते हुए,
पीछे रह गए सब अहबाब और तुम्हारा ही घर।

ये कैसी तलाश है तुम्हारी, जो कभी थमती ही नहीं,
दूर ले गई हम से, हमारा मंज़िल-ए-हमसफ़र ।

ये हमसे िकस्मत का मज़ाक़ नहीं तो और क्या है,
हम तुम्हें तलाशते रहे और तुम हो ख़ुद से ही बेख़बर ।

samajaate  



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