Sunday, 27 January 2013


तलाशते ही रह गए,.
हो गए किस क़दर दर-ब-दर,,
समजाते ही रह गए,
ना समजे  जिंदगी है अजीब सफ़र,,
हम दूर निकल आए,
मंजील को तलाशते हुए,
पीछे रह गए सब,
अहबाब और हमारा ही घर,,,,,,,
ये कैसी तलाश है हमारी,
जो कभी थमती ही नहीं,
रास्ते ही रास्ते हे जहां,
ना मंज़िल हे ना कोई घर,,,,,,,
खुदा भी हमीं से करे हे,
मज़ाक़ नहीं तो और क्या है,
हम ख़ुद ही को तलाशते रहे,
ओर ख़ुद से ही हे बेख़बर,,,,,,मुकेश जोशी,,,,

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