Sunday, 10 March 2013

Akhilesh Sharma 8 hours ago " जिनसे हम छूट गये.. अब वो जहां कैसे हैं... शाखे गुल कैसे हैं .. खुश्बूह के मकां कैसे हैं ; ऐ सबा ! तू तो उधर से ही.. गुज़रती होगी... उस गली में.. मेरे पैरों के निशां कैसे हैं ; कहीं शबनम के शगूफ़े .. कहीं अंगारों के फूल... आके देखो.. मेरी यादों के जहां कैसे हैं ; मैं तो पत्थर था .. मुझे फेंक दिया.. ठीक किया... आज उस शहर में .. शीशे के मकां.. कैसे हैं ..." जिनसे हम छूट गये .. अब वो जहां .. कैसे हैं ।। ~~~~~~~~~~~ ' राही मासूम रज़ा '

No comments:

Post a Comment