चलो जाओ.. हटो.. कर लो.. तुम्हें जो वार करना है...
हमें लड़ना नहीं है.. बस.. हमें तो प्यार करना है ;
मुहब्बत लाख गहरी हो.. मगर ये बात लाज़िम है...
कि पहली बार में तो.. हुस्न को.. इन्कार करना है ;
अभी कुछ शेर.. सीना चीर कर.. उतरा नहीं करते...
तिरे अबरू को.. थोड़ा और भी.. ख़मदार करना है ;
इसी चक्कर में.. हमने सैकड़ों.. दीवान पढ़ डाले...
सुना कर शेर.. उसको .. प्यार का इज़हार करना है ;
ये क्या है.. अब कहानी.. बीच में क्यों रोक रक्खी है...
ज़बाँ को ही.. नज़र के बाद बस.. इक़रार करना है ;
मुझे जाने दो.. मेरे और भी.. कुछ काम बाक़ी हैं...
जिसे महफ़िल सजानी है .. उसे तैयार करना है..."
~~~~~~~~~~~~~~~ ' अना कासमी '
अबरू : भवें
ख़मदार : टेड़ा
दीवान : ग़ज़ल की पान्डो लिपि ग़ज
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