Tuesday, 8 January 2013


परिशा हो के मेरी खाक,
आख़िर दिल ना बन जाए,
जो मुश्किल अब हे या रब,
फिर वोही मुश्किल ना बन जाए,
उरूज-ए-आदम-ए-खाकी से,
अंजुम सहमे जाते हे,
के ये टूटा हुआ तारा,
माह-ए-‍तमिल ना बन जाए,
मेरा मकाम अर्स था लेकिन अब फर्स हे,
आसमां से उतारा गया,
में तो आ-दम,
आ-दम ,से हुई ना फरमानी,
जन्नत से उथा दाना-पानी,
दाना होकर नादां बना,
एक दाने पे एक दिन नादान,
खता शैतान की आदम को,
खींचा पाव से जन्नत से,
ना था कुछ तो खुदा था,
कुछ ना होता तो खुदा होता,यहा होना ना होना हे,
ना होना में एहले होना हे
ना था कुछ तो खुदा था,
कुछ ना होता तो खुदा होता,
डुबोया मुजको होने ने,
ना में होता तो क्या होता,
यहा होना ना होना हे,
अगर पेहरे माहानी से ,
ये कतरा जुदा ना होता,
जिंदगी मौत का निशाना हे,
सबको यहा से एक दिन जाना हे,







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