Saturday, 23 February 2013


शायर है वो कोई दीवाना तो नहीं
लपटों में झुलसे वो परवाना तो नहीं
मगरिब का तारा, इस्मे-आज़म का प्यारा
अपना न सही लेकिन बेगाना तो नहीं

साहिबाँ हूँ मैं कोई फ़नकार तो नहीं
मेरे वास्ते यूसुफ़ का बाज़ार तो नहीं
झूठी रवायत मैं लानत पे भेजूं
दौलत-शोहरत मेरे यार तो नहीं

मकाँ टूटा है कोई घर तो नहीं
आवारा हूँ पर दर -बदर तो नहीं
रसम तोड़ना ख़ूब आता है मुझको
क़सम तोड़ने का हुनर तो नहीं

एक ही है ऊपर, दस-बीस तो नहीं
ख़ुदा है ख़ुदा, नक़्शानवीस तो नहीं

_______________________साहिब, बीबी और ख़ुदा

[साहिब दुनियादार हैं , बीबी बेक़ार हैं और ख़ुदा है कि थोड़ा ग़ैर ज़िम्मेदार है. सब गड्डमगड्ड कर के ये एक महाबकवास देसी सोनेट तैयार है. ऐंवें ! मस्ती में.]

No comments:

Post a Comment