कोई गेसू कोई आँचल हमे आवाज़ ना दे,
अब किसी आँख का काजल हमे आवाज़ ना दे,
हम हे खामोश तो खामोश ही रहने दो हमे,
कोई आहट कोई हल-चल हमे आवाज़ ना दे,
हमने तन्हाइ को मेहबूब बना रख्खा हे,
रख के ढेर में शोलों को दबा रख्खा हे,
राख के ढेर को बिखरा गई जब तैज़ हवा,
सुनी-सुनी सी फिजां ओ में धुँआ उठने लगा,
आँच देने को उभर आई चिंगारी,
ओर भडकता हुआ शोला भी नजर आने लगा,
किस कदर आग को सीने में छुपा रख्खा था,
रख के ढेर में शोलों को दबा रख्खा था,
सोये जज़्बात को उकसा के ये क्या कर बैठे,
आज हम जोश में यूँ आके ये क्या कर बैठे,
तक रहे हे सभी हैरान निगाहों से हमे,
हम भी हैरान हे, गभराके ये क्या कर बैठे,
क्या हुआ था हमे क्यू होंश गवा रख्खा था,
राख के ढेर में शोला को दबा रख्खा था,
फिर पुकारा हे महोब्बत ने हमे क्या कीजे,
दी सदा हुश्न की जन्नत ने हमे क्या कीजे,
जिसके सा इश्क की अकसर हमे डर लगता था,
छु लिया फिर उसी हसरत ने हमे क्या कीजे,
हमने जज़्बात से दामन को बचा रख्खा हे,,,
राश आए ना कभी प्यार के हालात हमे,
दिल के इस खेल में हर बार हुई मत हमे,
क्या करेंगे, कहा जायेंगे किधर जायेंगे,
दे गई जब भी दगा गर ये मुलाकात हमे,
राख के ढेर में शोला को दबा रख्खा था,
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