Saturday, 1 December 2012


नासिर क्या केहता फिरता हे,
कुछ ना सुनो तो बेहतर हे,
दीवाना हे, दीवाने के,
मुँह ना लगो तो बेहतर हे,
कपड़े बदल कर बाल बनाकर,
कहा चले हो किसके लिए,
रात बहोत काली हे नासिर,
घर में रहो तो बेहतर हे,,
नए कपड़े बदलकर जाउ कहा,
ओर बाल बनाऊ किसके लिए,
वो शख्स तो सहेर ही छोड़ गया,,,,,,,,,,,
जिस धूप की दिल में ठंडक थी,
वो धूप उसी के साथ गई,
इन जलती-भलती गलियों में,
अब खाक उड़ो किसके लिए,
वो सहर में था तो उसके लिए ,
औरों से भी मिलना पड़ता था,
अब ऐसे वैसे लोगो के ,
में नाज़ उठाऊ किस के लिए,

मुद्दत से कोई आया ना गया,
सुन-सन्‌ पड़ी हे घर की फज़ा,
इन खाली कमरों में ,
अब शम्म जलाऊँ किसके लिए,,,

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