Saturday, 1 December 2012



बहोत दिनों की बात हे,
खिजाँ को याद भी नही,
ये बात आज की नही,,,,
बहोत दिनों की बात हे,,,,,,
शबाब पर बहार थी,
फिज़ा भी खुश-गवार थी,
ना जाने क्यू में चल पड़ा,
में अपने घर से चल पड़ा,
किसी ने मुजे रोक कर,,
बड़ी अदा से टोक कर,
कहा था लौट आइए,
मेरी कसम ना जाइये,
पर मुजे ख़बर ना थी,
माहौल पर नजर ना थी,
ना जाने क्यूँ मचल पड़ा,
मे अपने घर से चल पड़ा,
में चल पड़ा,
में शहर से फिर आ गया,
खयाल था के पा गया,
उसे जो मुजसे दूर् थी,
मगर मेरी जरूर थी,
ओर एक हसीन शाम को,
में चल पड़ा सलाम् को,
कली का रंग देखकर,
नइ तरंग देखकर,
मुजे बड़ी खुशी हुई, खुशी हुई,
में कुछ इसी खुशी में था,
किसी ने जाँक कर कहा,
पराया घर से जाइये,
मेरी कसम ना आइए,
वो ही हसीन शाम हे,
बहार जिसका नाम् हे,
चला हूँ घर को छोड़कर,
ना जाने जाऊंगा किधर,
कोई नहीं जो टोक-कर,
कोई नहीं जो रोक-कर,
कहे के लौट आइए,
मेरी कसम ना जाइये,,,,,
मेरी कसम ना जाइये,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment