तुजको दरीया दिली की कसम साकीया,
रौनकें मै-कदा यूँ ही बढ़ती रहे,
एक गिरता रहे एक सम्हलता रहे,,,
एक शबनम ही शाने गुलीस्तान नही,
शोला-ओ-गुल का भी दौर चलता रहे,
अश्क भी चश्म-ए-पूर-नम से बेहते रहे,
ओर दिल से धुना भी निकलता रहे,
तेरे कब्जे में हे ये निजाम-ए-जहां,
तू जो चाहे तो सहेरा बने गुलसीतां,
हर नजर पर तेरी फुल खिलते रहे,
हर इशारे पे मौसम बदलते रहे,
तेरे चेहरे पे ये ज़ुल्फ बिखरी हुई,
नींद की गोद में सुबहा निखरी हुई,
ओर इस पर सितम ये अदा ये तेरी,
दिल हे आख़िर कहा-तक सम्हलता रहे,,,,,
इस में खून-ए-तमन्ना की तासीर हे,
ये वफ़ा ये महोब्बत की तस्वीर हे,
एसी तसवीर बदले ये मुमकिन नही,
रंग चाहे जमाना बदलता रहे,,,,,
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