लेकर तुम्हारा नाम जहां सर जुका दीया,
मेने उसी दयार को काबा बना दीया,
सर जुकाया तो पत्थर सनम बन गये,
इश्क भटका तू हद आसना हो गया,
रश्क करता हे काबा मेरे कुफ्र पर,
मेने जिस बुत को पुजा खुदा हो गया,
घूम रही हे के मि राज हे इश्क की,
हे ये जुनूं तू ये मंज़िल हे कोनसी,
उसके घर का पता पूछते-पूछते,
पूछने वाला ख़ुद लापता हो गया,
में महोब्बत से मुँह मोड़ लेता अगर,
टूट पड़ती ये बिजली किसी ओर पर,
मेरे दिल की तबाही से ये तो हुआ,
कम-से-कम दुसरो का भला हो गया,
वक्त -ए-एहबाब परछाई सूरज ग्रिहन,
लोग दुनिया खुशी चांदनी जिंदगी,
मेरे मेहबूब एक तेरे घर के सिवा,
रास्ते जो मिला वो जुदा हो गया,
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