Saturday, 1 December 2012


बहोत दिनों की बात हे,
खिजाँ को याद भी नही,
ये बात आज की नही,,,,
बहोत दिनों की बात हे,,,,,,
शबाब पर बहार थी,
फिज़ा भी खुश-गँवार थी,
ना जाने क्यू में चल पड़ा,
में अपने घर से चल पड़ा,
किसी ने मुजे रोक कर,,
बड़ी अदा से टोक कर,
कहा था लौट आइए,
मेरी कसम ना जाइये,
पर मुजे ख़बर ना थी,
माहौल पर नजर ना थी,

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