Thursday, 6 December 2012


बरसो के इंतज़ार का अंजाम लिख दिया,,,,,,,
कागज पे शाम काट के फिर शाम लिख दीया,,,,
बिखरी पड़ी थी टूट के, कलियां जमीन पर,
तरतीब दे के मेने तेरा नाम लिख दीया,,,,,
आसाँ नही तर्क-ए-महोब्बत की दास्ताँ,
जो आँसू ओ ने आखरी  पैग़ाम लिख दीया,,,
हम को किसी के हुश्न ने शायर बना दीया,
होठों का नाम लिख ना सके, जाम लिख दीया,
अल्लाह जिन्दगी से कहा तक निबाहु में,
किस बे-वफ़ा के साथ मेरा नाम लिख दीया,
तकसीम हो रही थी, खुदाई की नैमते,
एक इश्क बच गया, सो मेरा नाम लिख दीया,

"कैशर" किसी की दैन हे ये शायरी मेरी,
इश्की गजाल पे जिस में मेरा नाम लिख दिया,





No comments:

Post a Comment