Sunday, 18 November 2012

न पूछो हिज्र ने क्या क्या हमें जलवे दिखाए हैं
इधर आँखों में अश्क़ आए उधर हम मुस्कुराए हैं

तमन्ना, तू तो थी मासूम, तुझ से क्या गिला शिक़वा
कि जो भी दिल पे टूटे, चर्ख़ ने वो ज़ुल्म ढाए हैं

अजब शय है मुहब्बत भी, सिखा जाती है क्या क्या कुछ
हंसी लब पर है और पलकों तले दरिया छुपाये हैं

शब-ए-हिज्राँ ये मत पूछो, कि क्या क्या दिल पे गुज़री है

कि लिख कर जाने कितने ख़त उन्हें ख़ुद ही जलाए हैं

किसी के दर पे सौ सौ बार यूं बैठे हैं जा जा कर
कोई देखे तो ये समझे, कि उस के ही बुलाए हैं

कोई उम्मीद अब ऐ आसमाँ तुझ से नहीं मुझ को
तेरी रहमत से आखिरकार अब हम बाज़ आये हैं

कभी इक बार तू भी 'मीत' ले ले इम्तिहाँ उस का
सुना है इश्क़ ने भी आसमाँ क्या क्या झुकाए हैं

__________________________________ मीत

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