चंद लफ्ज़ों में बया नही होगा,
कागजों कलम कद नही रखते ,
ओर सिमट जाए तो शीर्फ ढाई लफ्ज काफी हे,
वो किताबों की दरकार नही करते,,,,,,,,,,,,,,,,,mukeshjoshi,,,,
हम बुतों को जो प्यार करते हे,
नकले परवर-दीगर करते हे,
क्या महोब्बत भी कोई पेशा हे,
लोग क्यूँ इतने प्यार करते हे,
इतनी क़समें ना खाओ गभराकर,
जाओ हम एतबार करते हे,
क्या अदा निसार होने की ,
उन से पेहलू बचा रहा हूँ में,
कितनी पुख्ता हे मेरी नादानी,
तुजको तुजसे छुपा रहा हूँ में,
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