Thursday, 22 November 2012


ना-जाने ये किस-किस का करज-दार हूँ में,
रब जाने कैसे-कैसे गुनाह् का गुनाह्-गार हूँ में,
एक मुद्दत हो गई ,ख़ुद को में पुरा,
तन्हा भी नही कर पाया,
या समजलु के मेरा दामन उसे भी राश ना आया, ,,,,,,,mukesh joshi,,,,,
मेरी तन्हाइओ तुम यूँ लगालो मुजको सीने से,,,,,,
के में गभरा गया हूँ इसतरहा रो-रो-के जिने से,,,,,,
ये आधी रात को फिर चूडि़यां सी क्या खनकती हे,
कोई आता नही,या मेरी ही जंजीरें जनकती हे,
ये बातें किस तरहा पूछूं सावन के महीने से,,,,,,,,,,,
के में गभरा गया हूँ इसतरहा रो-रो-के जिने से,,,,,,,,,,

पी ने दो, मुजे अपने ही लहू का जाम पीने दो,
ना सीने दो किसी को भी मेरा दामन ना सीने दो,
मेरी वहेशत ना बढ़ जाए कही, दामन के सीने से,,,,,,,,
के में गभरा गया हूँ इसतरहा रो-रो-के जिने से,,,,,,,,

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