Sunday, 25 November 2012

आज भी मैंने कई इंसान देखे ।
रूबरू उनके कई तूफ़ान देखे ॥

मुस्कुराते मिन्नते करते जो आए
बन गए मालिक कई मेहमान देखे ॥

बेवफ़ाई के कई दीवान पढकर
इश्क में लुटते कई सुल्तान देखे ॥

शहर में पैगम्बरों का वेश धरकर

ज़िबह करते जो कई शैतान देखे ॥

इस सियाही रात में शमाँ लेकर
जगमगाते जो कई ईमान देखे ॥

'दास' का कहना न मानो, सोचिए खुद
भीड में शामिल कई नादान देखे ॥

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