Tuesday, 27 November 2012


ना उड़ा यूँ ठोकरों में, मेरी खाके कब्र जालिम,
बस येही एक रेह गई हे , मेरे प्यार की निशानी,,,,,
तुजे पेहले ही कहा था,हे जहां हे ,सराये फ!नी,
दिले बड़-नसीब तूने मेरी बात ही ना मानी,
सोचते ओर जागते, सांसो का एक दरीया हूँ में,
अपने गुम-गस्ता किनारों के लिए बेहता हूँ में,,,,,,,,,,,

कभी कहा ना किसी से तेरे फसाने को,
ना जाने कैसे ख़बर हो गई जमाने को,,,,,,,
सुना हे गैर की महफिल में तुम ना जाओगे,
कहो तो आज सज़ा लू गरीब खाने को,,,,,,,,,,,,,,

जल गया सारा बदन इन मौसमों की आग में,
एक मौसम रूह का हे जिसमे अब जिन्दा हूँ में,,,
मेरे होठों का तब्स्सुम दे गया धोखा तुजे,
तूने मुजको बाग जाना, देखले सहरा हूँ में,,,,,,,,,,,

देखिये मेरी पझीराइ को अब आता हे कौन,
लम्हा भर को वक्त की देहलीज पर आया हूँ में,,,
इसका रोना नही कयूँ तुमने किया दिल बरबाद,
इसका गम हे बहोत देर में बरबाद किया,,,,,,,,
मुजको तो होश नही, तुमको ख़बर हो शायद,
लोग केहते हे की तुमने मुजे बरबाद किया,,,,,,,,,,,,





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