जाने क्या ढूँढती रेहती है ये आँखें मुजमे,
राख के ढेर में शोला हे ना चिंगारी है,,,,
अब ना वो प्यार ना उस प्यार की यादें बाकी,
आग यूँ दिल में लगी कुछ ना रहा कुछ ना बचा,
जिसकी तसवीर निगाहों में लिए बैठी हो,
में वो दिलदार नही, उसकी खामोश चिता,
जिंदगी हँस के गुजरती तो बहोत अच्छा था,
खैर हँस के ना सही रोके गुजर जायेगी,
राख बरबाद महोब्बत की बचा रख्खी हे,
बार-बार इसको जो छेड़ा तो बिखर जायेगी,,,
आरज़ू जुर्म वफ़ा जुर्म, तमन्ना हे गुनाह्,
ये वो दुनिया हे जहां प्यार नही हो शकता,
कैसे बाज़ार का दस्तूर तुम्है समजाउ,
बिक गया जो वो खरीदार नही हो शकता,
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