Friday, 16 November 2012


गुलशन की फकत फूलों से नही,
काँटों से भी ज़ीनत होती हे,
जिने के लिए इस दुनिया में,
गम की भी जरूरत होती हे,,,,,
ए वाइसे नादा करता हे,
तू एक कयामत का चर्चा,
यहा रोज़ निगाहे मिलती हे,
यहा रोज़ कयामत होती हे,
वो  पुर्सीश-ए-गम को आए हे,
कुछ कैह् ना शकु, चुप रह ना शकु,
ख्वाहीस नम मुश्किल हे,
केह दु तो शिकायत होती हे,,,
करना ही पड़ेगा जब्ते गम,
पीने ही पड़ेंगे ये आँसू,
फरियादो को माजी कैह् देना,
तौहीने मोहब्बत होती हे,,,,,,
जो आके रुके दामन पे सबा,
वो अश्क नही हे पानी हे,
जो अश्क ना छलके हौथोसे,
वो अश्क की कीमत होती हे,,,,
गुलशन कि फ़क़त फूलों से नहीं काटों से भी जीनत होती है,
जीने के लिए इस दुनिया में ग़म कि भी ज़रूरत होती है.

ऐ वाइज़-ए-नादां करता है तू एक क़यामत का चर्चा,
यहाँ रोज़ निगाहें मिलती हैं यहाँ रोज़ क़यामत होती है.

वो पुर्सिश-ए-ग़म को आये हैं कुछ कह ना सकूं चुप रह ना सकूं,
खामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दूं तो शिक़ायत होती है.

करना ही पड़ेगा जब्त-ए-अलम पीने ही पड़ेंगे ये आंसू,
फरियाद-ओ-फुगाँ से एय नादाँ तौहीन-ए-मोहब्बत होती है.

जो आके रुके दामन पे 'सबा' वो अश्क नहीं है पानी है,
जो अश्क ना छलके आंखों से उस अश्क कि कीमत होती है.

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