ले उससे भी कुछ जिने के गुर,
इनसान हो के इतना ना "इतरा",
जानवर से भी कुछ जीना सिख जां,
जहां हो वफादारी कुत्तों की दी जाती मिशाल,
जय-चंद विभीषण हे ,इंसान की संतान,
वैसे भी कुत्तों से ज्यादा नही किम्मत इनसान की
उसे डायरेक्ट खाना देता हे परवर-दीगार भी,
नही बोना धोना काटना, पड़ता हे बार-बार,
नही लगता खाने में उसे तड़का ,ओर अचार,
कच्चा भी हजम होता हे उसे ,
नही वैद- हकीम की जरूरत उसे,
गझब की दी हे "आका" ने उसे सूँघ ने की ताकत,
इनसान को दिखता हे वो हे रात में इनसान की औकात,
वो तो भौंकता हे, "चोर"को देखकर,
केहता हे इनसांकी औलाद अब तू सुधर,
अपने मालिक से रेहता हे वो वफ़ादार,
जां की भी बाजी लगता हे वो जानिसार,
हो शके तो तुम भी फेर लो कुत्ते की माला,
जीवनी सुधर जायेगी, हो जाओगे इनसान आला,
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