सरोज जी, मेने देखा हे हर कुए की,
उपरली सतह को प्यास से तड़पते हुए,
हर कुआ भीतर अपनी गेहराइ को गोल करता हे,
पानी के किसी स्त्रोत से सराबोर करता हे,
भूल से किसी बाल्टी से,
कुछ पानी टपक जाता हे ,
मानो कुए की उपारली सतह पे,
सावन आ जाता हे,
कुछ लत्ता ए, आस्-पास की,
हरी-भरी होके मुस्काती हे,
तब एहसास होता हे,
के कुआ प्यासे के पास हो के भी,
प्यासे के पास नही जाता हे,
वो तो ख़ुद अपनी ही उपरली सतह को भी तड़पता हे,
No comments:
Post a Comment