ये जिंदगी,
ये जिंदगी,.......
आज जो तुम्हारे, बदन की छोटी बड़ी नसों में,
मचल रही हे, तुम्हारे पैरो से चल रही हे,
तुम्हारी आवाज़ में, गले से निकल रही हे,
तुम्हारे लफ्ज़ों में ढल रही हे,.......ये..जिंदगी,
ये जेंदगी जाने कितनी सदियों से,
यु ही शक्लें बदल रही हे, ये ..जिंदगी....
बदलती शक्लें, बदलते जिस्मो ,
में चलता फिरता ये एक शरारा,
जो इस घड़ी नाम हे तुम्हारा,
इसी से सारी चहल-पहल हे,
इसी से रोशन हे हर नजारा,
सितारे तोडों ,या घर बसाओ,
अलम उथाओ, या सर जुकाओ,
तुम्हारी आँखों की रोशनी तक,
हे खेल सारा,
ये खेल होगा नही दुबारा,
ये खेल होगा नही डूबरा,
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