जिंदगी के उसी मोड़ पे,हम आश लगाये खड़े हे,
पैरों में उस के वादों के, भँवर लिपटे पड़े हे
किस ख़ूबसूरती से बिना कहे चला गया वो,
इक उम्र बीत गई उसी जगह आज भी खड़े हे,
के डूब भी जाए साँसें, इंतज़ार के दरीया में,
हम सफीनो के सहारे, अपनी उम्मीद पे अड़े हे
एक अहल्या थी जो पत्थर सी पथराई थी,
एक हम हे के बनके "बुत" ठोकरों में गड़े हे
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