Friday, 31 August 2012


मुँह की बात सुने हर कोई,
दिल के दर्द को जाने कौन,
आवाजों के इस बाज़ारों में ,
खामोशी पेहचाने कौन,,,,,,,,,,,,,
सदियों-सदियों वो ही तमाशा,
रस्ता-रस्ता लम्बी खोज,
लेकिन जब हम मिल जाते हे,
खो जाता हे, जाने कौन,,,,,,,,,,,

वो मेरा आइना हे तो,
में उसकी परछाइ हूँ,
मेरे ही घर में रेहता हे,
मुज जैसा ही जाने कौन,,,,,,,,,,,,,,,,,
किरण-किरण अलसाता सूरज,
पलक-पलक खुलती नींदे,
धीरे-धीरे बिखर रहा हे,
ज़र्रा-जर्रा जाने कौन,,,,,,,,,,,,,

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