''हज़ारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखली,
वह असरदार तूने ग़ालिब बनके , बढ़िया तुक-बंधी करदी,
आज दाने-दाने को मोहताज हे देश का आम इंसान,
घोटालों-पे घोटाले, फिर भी कुछ नही बोले,
अब भी केहते हो "मैडम" के कहे की मेने आबरू रखली,
कलमाड़ी, राजा,चिद्दु ओर अब ख़ुद भी देश नैया, भवंर के हवाले कर् दी,
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