Monday, 6 August 2012

पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम , पत्थर के ही इनसान पाये हे,
तुम शेहरे मुहोब्बत केहते हो, हम जान बचाकर आए हे,
बुत-खाना समजते हो जिसको, पूछौना वहा क्या हालत हे,
हम लोग वही से लौटे हे, बस शुक्र करो लौट आए हे,

हम सोच रहे हे मुद्दत से, अब उम्र गुजारे भी तो   कहा,
सेहरा में खुशी के फुल खिले, शेहरो में ग़मों के साये हे,
होठों पे तबस्सुम हलका सा,आँखों में नमी सी हे "फाकिर",
हम एहले मुहोब्बत पर अकसर एसेभी जमाने आए हे,

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