Monday, 18 June 2012

शुशिल जी , ये राजकारण की मंडी हे,
 दीखती सफेद उतनी ही गंदी हे.
यहा कोई किसी का सगा नही,
ऎसा नही कोई जिसने, किया दगा नही,
यहा हर नर बस मदारी हे,
हर नारी देखो मदारीन हे,
हर एक अपनी -अपनी बिन बजाते हे,
वोटर को अपनी धुन पर नाचते हे,
वेश्या भी तो एक रात किसी की होती हे,
अपने असुलो का बो़ज वो भी ढोतीं हे,
इस मंडी में आइडीयोलोजी कहा चलती हे,
ये वेश्याघर एसा हे जहां खरीद फरौख ही चलतीहे,
सब के सब सत्ता के दलाल यहा बैठे हे,
करोड़ों में नही अब तो अरबों पे ऐंठे हे,
अब कहां रही इनमें ईमान दारी भाइ,

ईमानदार की तो इन्होंने धोती तक उतरवाई,
लगता हे अब वोटर के तन कच्छा ही बचेगा,
नंगे भारत का सपना अब उनका खूब रचेगा,

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