तारों को , सय्यारो को,
देखना लिखवालाते नसीब में,
बहारो के मौसम फूलों के गुलदस्ते,
काश आपने माँगें होते रब से,
आने के लिए पंडित का घराना चुना,
कर्म के रूप में सरस्वती को देवी बुना,
अब शब्जी , दाल, आता चावल चुन रहे हो,
बैठे बैठे अपने नसीब को धुन रहे हो,
ओर भाग्यवान भी आपने ऐसी ही चुनी,
सरस्वती उपाशक वो भी कर्म अनुरूप गुणी,
अब "उल्लूक"नाम रखने से "चुल्लू "नही भरेगा,
लक्ष्मी जी का वाहन धरे संकट दूर् नही होगा,
अब सरस्वती जी की उपासना छोड़ के,
लक्ष्मी जी के चरण पकड़ लो,
हो शके तो ख़ुद में बनिया गिरि धरलो,
देखो फिर बहरे आयेंगी,
आपको लुभायेगी,
सफेदी आपके बालो से ,
कोषों दूर् चली जायेगी,
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