Friday, 8 June 2012

तन सब का धुला हुआ हे,
अब कुछ मन धुलवओ,
शुशिल जी, अपने नाम के हिसाब से,
शील-वान इनको बनाओ,
भगत सिंह, जगत से चले गए,
देश की खातीर लटक गये,
इनका कहा कोई मरा हे,
बे-इमानी के रोटी पे ,
जिनका कुनबा खड़ा हे,
ऎसे भ्रष्ट नेता ओको,
गंगा में ले-जाकर दुबाओ,
तोप हो या घास हो,
मन-मोहन जहां दास हो,
गॊरी चमड़ी पे मरते हे,
सच्चाई ताक पे धरते हे,
उन्हें जीवन का मूल्य सीखाओ,
आज जो पशु बन घूम रहे हे,
मानव का बहुमूल्य परिवेश धरे हे,
लेकिन करनी उनकी,
मानवता से परे हे,
कुछ ऎसा एहसाँस ,

मानवता का उनमे जगाओ,
अब तो तभी मुँह धोना हे,
पेहले इन पशुओको धोना हे,
चाहे अन्ना टोपी लगाओ,
चाहे कितने अनशन लगवाओ,
अब थोड़ी डन्डा गिरि सीखाओ,
इन काफिरों का भूत भागो,

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