" ये मक़ामे इश्क़ है कौनसा.. कि मिज़ाज सारे बदल गए...
मैं इसे कहूँ भी तो क्या कहूँ.. मिरे हाथ फूल से जल गए ;
तिरी बेरूख़ी की जनाब से.. कई शेर यूँ भी अ़ता हुए ...
के ज़बाँ पे आने से पेशतर.. मिरी आँख ही में मचल गए ;
तिरा मैकदा भी अ़जीब है.. कि अलग यहाँ के उसूल हैं...
कभी बे पिए ही बहक गए.. कई बार पी के सम्हल गए ;
सुनो ज़िन्दगी की ये शाम है.. यहाँ सिर्फ़ अपनों का काम है...
जो दिए थे.. वक़्त पे जल उठे.. थे जो आफ़ताब वो ढल गए ;
कई लोग ऐसे मिले मुझे.. जिन्हें मैं कभी न समझ सका...
बड़ी पारसाई की बात की.. बड़ी सादगी से पिघल गए ;
ज़रा ऐसा करदे तू ऐ ख़ुदा.. कि ज़बाँ वो मेरी समझ सकें ...
वो जो शेर उनके लिए कहे.. वही उनके सर से निकल गए .
No comments:
Post a Comment